गुरुवार, 13 अप्रैल 2017

शादी करूं या न करूँ ये मेरी मर्जी है


पति अच्छा है, कमाता है, मारता नहीं, पीता नहीं, प्यार करता है, रात को साथ सोता है, पत्नी के रिश्तेदारों का आदर करता है, पहनाता ओढ़ाता ढंग से है, घर टाइम पर लौट आता है, दोस्तों के सामने निरादर नहीं करता, तू तड़ाक नहीं करता, मेरे बनाये खाने की तारीफ़ के पुल बाँध देता है सबके सामने…..इतना सब कुछ….ओह मैं कितनी प्रिविलेज्ड हूं| यार कुछ भी कहो, किसी सक्सेसफुल इंसान के साथ शादी होने के बाद ही लाइफ रियल में सेट होती है| इसके बाद कोई टेंशन नहीं है| पर तुम अभी इन सब बातों को नहीं समझोगी| इसलिए तो कहती हूं कि तुम भी शादी कर लो!



शादी के बाद माधवी से ये मेरी पहली मुलाक़ात थी| उसकी शादी को अभी दो साल हुए थे| जब मैंने उससे पूछा कि और बताओ कैसी हो? कैसा चल रहा है सब?तो एक सांस में माधवी ने अपने पति का गुणगान करते हुए, शादी के महत्व को समझाकर मुझे भी शादी की सलाह दे डाली| उसकी ये बातें सुनकर मुझे दुःख हुआ कि उसकी इन बातों में खुद का कोई जिक्र नहीं था| उसकी बातों से ऐसा लग रहा था जैसे उसके पास अपना कुछ हो ही न बताने को|
माधवी उस समय मास्टर्स के फाइनल इयर में थी जब उसकी शादी तय हुई थी| पढ़ाई-लिखाई में अच्छी माधवी ने अपनी ज़िन्दगी के लिए कोई लक्ष्य निर्धारित नहीं किया था| करियर के बारे में बात करने पर वो हमेशा कहा करती – ‘यार देखा जायेगा| पहले डिग्री पूरी कर लूँ और वैसे भी पापा कह रहे थे कि इसके बाद शादी कर देंगे|माधवी का यह जवाब हमेशा मुझे इस बात पर सोचने के लिए मजबूर कर देता कि पढ़ाई का फ़ैसला जब उसने खुद लिया तो पढ़ाई के आगे के भविष्य को पापा के डिसिजन पर क्यूँ छोड़ दिया है? तमाम मुद्दों पर विचार देने वाली माधवी क्या खुद के लिए कुछ भी सोचने-करने में असक्षम है?
शादी फिक्स होने के बाद वो बेहद खुश थी| उसकी जुबान पर हमेशा अपने होने वाले पति का गुणगान हुआ करता था| और वो अक्सर ये बात कहती कि मेरा तो पर्मानेंट प्लेसमेंट हो गया है| अब तुम लोग भी जल्दी से अपनी लाइफ सेट कर लो| जैसे उसके लिए शादी करना ही लाइफ सेटकरना हो|
बचपन से ही दी जाती शादीवाली घुट्टी
हमारे समाज में हमेशा से महिलाओं के संदर्भ में शादीको उनके जीवन का अहम हिस्सा बताया गया है और उनके समाजीकरण में इस बात का ख़ास ख्याल भी रखा जाता रहा है| अक्सर छोटी बच्चियां जब रोती है तो उन्हें यह कहकर चुप कराया जाता है कि अभी सारे आंसू बहा लोगी तो विदाई में आंसू कैसे आयेंगे|मजाक में कही ये बातें बच्चों के मन में एक गहरी छाप छोड़ देती है और इसकी शुरुआत लड़कियां बचपन से ही अपने गुड्डे-गुड़ियों की शादी करवाने से कर देती है| बात चाहे सजने-संवरने की हो या किसी लड़की का घरेलू कामों में निपुण होने की हो, हमेशा इन गुणों को शादी से जोड़ दिया जाता है| यह किस्सा न केवल हमारे इतिहास का रहा है, बल्कि वर्तमान समय का भी है, जहां माधवी अकेली नहीं है| उसकी जैसी तमाम लड़कियाँ है जिनके लिए आज भी बचपन में दी गई शादीवाली घुट्टी उनके लिए शादी को जीवन का अंतिम लक्ष्य बना देती है और किसी सक्सेसफुल आदमी से शादी हो जाने पर उन्हें अपने जीवन की सार्थकता नज़र आने लगती है|
यह दुखद है कि जब प्रशासनिक सेवा से लेकर राजनीति, अभिनय, लेखन, रक्षा और दुनिया के सभी क्षेत्रों में महिलाएं अपनी सफलता का परचम लहरा रही है| ऐसे दौर में कई महिलाएं ऐसी भी हैं जिन्हें उच्चतर शिक्षा के मेडल और डिग्री की तो चाहत है पर उनके जीवन का लक्ष्य शादी तक ही सिमटा हुआ है क्योंकि उनके समाजीकरण में शादीके महत्व की बातों को एक घुट्टी की तरह उन्हें पिलाया जाता है और बड़ी होकर वे इसे आत्मसात कर जीने लगती है या यूँ कहें कि जीने को मजबूर कर दी जाती है|
शादी करूँ या न करूँमेरी मर्जी
मैं शादी के खिलाफ़ नहीं हूं| मैं खिलाफ़ हूं शादी को अपनी ज़िन्दगी मानने से| खुद के लिए ज़रूरी मानने से| शादी, पति और परिवार को एक ऐसी दीवार बनाकर जीने से, जिसके अंदर आपका अपना अस्तित्व धूमिल होने लगे और आपकी पहचान सिर्फ बीवी, बहु, माँ, बेटी, चाची व मामी जैसे नामों तक सीमित हो जाए| साथ ही, पूरे दिन में आपका अपना कोई समय न हो| आपके पास खुद का कुछ बताने का न हो| शादी से पहले जीवन को लेकर आपके सपने आपकी एक अधूरी ख्वाइश बनकर रह जाए| यहां हमें इस बात को समझना होगा कि शादी हमारी ज़िन्दगी का एक हिस्सा है न कि पूरी ज़िन्दगी| शादी करनी है या नहीं ये आपकी मर्जी पर निर्भर होना चाहिए|
ध्यान रहे शिक्षा व योग्यता न बने आपकी किस्सा का हिस्सा
आपने भी कभी अपनी दादी-नानी व मम्मी-मौसी को यह कहते सुना होगा कि मैं तो पढ़ाई में बहुत अच्छी थी| मेरी अच्छी जॉब भी हो गयी थी, लेकिन फिर शादी हो गयी तो मैंने सबकुछ छोड़ दिया|कहते हैं कि जब आप अपनी कद्र करते है तो दुनिया आपकी कद्र करती है| इसी तर्ज पर, खुद के सफल व्यक्तित्व निर्माण के बाद की गयी शादी में कभी भी आपकी शिक्षा व योग्यता आपके किस्सों का हिस्सा नहीं बनेगी| शादी का मतलब ये नहीं कि आप अपने करियर व रूचि का त्यागकर सिर्फ गृहस्थी तक सीमित हो जाए|
माना मुश्किल है पढ़े लिखे को समझाना पर कोशिश में कोई हर्ज़ नहीं
समय बदल रहा है| लोग बदल रहें है| उनकी सोच बदल रही है| लेकिन शादीके संदर्भ ज्यादा कुछ नहीं बदला है| पहले लड़कियों की बचपन में शादी कर दी जाती थी| उन्हें ज्यादा पढ़ाया नहीं जाता था| लेकिन अब लड़कियों को पढ़ाया जाता है, फिर शादी के लिए कहा जाता है| उन्हें बचपन से सिखाया जाता है कि तुम्हें दूसरे के घर जाना है| तुम पराया धन हो| तुम्हें किसी और के लिए तैयार होना है|माधवी के संदर्भ में यह बात बेहद सटीक लगती है| क्योंकि उसने समाज में लड़की होने और उसके सार्थक जीवन के लिए शादी को एकमात्र अहम तत्व तौर पर न केवल स्वीकार कर लिया था बल्कि वह इसे जीने भी लगी थी| आधुनिकता के इस दौर में अक्सर कहा जाता है कि अनपढ़ों से ज्यादा पढ़े-लिखों को समझाना मुश्किल है पर कोशिश करने में कोई हर्ज़ नहीं है| पर उन्हें समझाने से साथ-साथ खुद को भी समझना होगा कि शादीजैसी समाजिक संस्था कभी हमारी मज़बूरी न बने|
लड़कियों, जी भरकर जियो ज़िन्दगी
बदलते समय के साथ अब शादी के मायने भी बदल रहे हैं| ये दौर अपने सपनों को उड़ान देने का है| ऐसे में शादी के नामपर खुद के सपनों को कुर्बान कर देना कहीं से भी आपको पतिव्रता नहीं बनाएगा, इस बात को अब समझना होगा| लड़कियों जमाने के लिए आप कितनी भी कुर्बान हो जाए, उँगलियाँ हमेशा आपके खिलाफ़ ही उठती रहेंगी| यह न केवल हमारा इतिहास रहा है, बल्कि यह हमारा वर्तमान भी है| इस बात को हमेशा याद रखें कि ये समाज कद्रदान हमेशा उसी शख्स का होता है जो खुद की कद्र करता है| न कि उसका जो दूसरों के लिए खुद को कुर्बान कर देता है| इसी संदेश के साथ आप पहले अपने व्यक्तित्व और सपनों की कद्र करें| और शादी को तभी स्वीकार करें जब ये आपकी मर्जी हो, न कि ज़िन्दगी के एकमात्र लक्ष्य के तौर पर (जैसा हमें बचपन से सिखाया जाता है)|

 (फेमिनिज्म इन इंडिया में प्रकाशित लेख)
https://feminisminindia.com/2017/03/27/marriage-choice-women-hindi/

शुक्रवार, 7 अप्रैल 2017

हिंदी साहित्य को जीवंत दिशा देने में सार्थक भावना शर्मा के ‘अतुल्य रिश्ते’


बचपन से हम सभी अपनी दादी-नानी से ढ़ेरों किस्से-कहानी सुनकर बड़े हुए है| वे कहानियां ही थी, जिन्होंने हमें कभी रात में चंदा मामा से मिलवाया तो कभी परियों के देश की सैर करवायी| अगर बात की जाए कहानी के इतिहास की तो हम यह कह सकते हैं कि शब्दों के साथ कहानियों के रचने का किस्सा शुरू हुआ| जैसे-जैसे शब्द रचते गए कहानियां बनती गयी|

प्रतिस्पर्धा के दौर में कोई भी क्षेत्र प्रतिस्पर्धा से अछूता नहीं रहा| फिर चाहे वो साहित्य जगत ही क्यूँ न हो| दिन दोगुनी रात चौगुनी की रफ्तार से बढ़ती प्रतिस्पर्धा के दायरे भी अब निरंतर बड़े होते जा रहे है| बात की जाए हिंदी साहित्य की तो प्रेमचंद, जयशंकर प्रसाद और महादेवी वर्मा जैसे प्रसिद्ध-प्रतिष्ठित लेखकों के दौर में रचना का निर्माण उसके सामाजिक सरोकार व देशकाल के आधार पर किया जाता था| लेकिन वर्तमान समय में रचना के निर्माण का आधार सीधे तौर पर उसके बाज़ार से जुड़ा है| आज ज्यादा पढ़े जाने वाले या यों कहें कि ज्यादा बिके जाने वाले लेखक सफल माने जाते है| रचनायें अब पाठक की रूचि और बाज़ार के अनुरूप गढ़ी जाने लगी है, न कि सामाजिक सरोकारों और देशकाल के अनुरूप| शायद यही वजह है कि बेहतरीन हिंदी-साहित्य के लिए आज भी हम प्रेमचंद व जयशंकर प्रसाद के दौर को याद करते है| क्योंकि वे रचनायें हमें जिंदगी जीने का ढंग सिखाती थी, समाज से रु-ब-रु करवाती थी और जीवन के तमाम रंगों को  हमारे देशकाल के अनुरूप ढालकर प्रस्तुत की जाती थी|

आजकल हर दूसरा इंसान कहता है कि लोगों में अब वैसी एकता और मेलजोल का भाव नहीं|’, ‘दुनिया अब स्वार्थी हो चुकी है|’, ‘कोई किसी का सगा नहीं ही|’.......! वाकई वर्तमान समय में यह बातें सच होती हुई, एक बड़ी समस्या के तौर पर हमारे समाज में फ़ैल भी रही है| यदि हम इस समस्या के कारण तलाशने की कोशिश करें तो हम यह पाते है कि बात चाहे टीवी जगत की हो या साहित्य-जगत की, हर जगह पश्चिमी-संस्कृति का प्रभाव तेज़ी से अपने पैर पसार रहा है, जिसमें व्यक्तिवादिता को ज्यादा महत्वपूर्ण ढंग से दर्शाया जा रहा है| पर व्यक्तिवादिता कभी-भी भारतीय संस्कृति का मूल नहीं रही है| कहते हैं कि मीडिया (जिसमें टीवी जगत और साहित्य जगत दोनों सम्मिलित है) समाज का आईना होती है और कई बार यह समाज को आईना दिखाने का भी काम करती है| इससे साफ़ है कि हम जैसा देखेंगे, जैसा पढ़ेंगे वैसा व्यवहार करेंगे| भौगोलिकरण के दौर में संस्कृति के आदान-प्रदान का ऐसा अँधा दौर चल पड़ा है जहां बिना देशकाल-वातावरण की पड़ताल किये हम सभी उस संस्कृति को आत्मसात करते जा रहे है, जो सीधे तौर पर हमारे विचार, व्यवहार और जीवनशैली को प्रभावित कर रही है

इस दौर में जब युवा रचनाकारों की पहली पसंद व्यक्ति केंद्रित कहानियां है, ऐसे में भावना शर्मा द्वारा रचित उनका पहला कहानी-संग्रह अतुल्य रिश्तेहिंदी-साहित्य में एक नई सुबह के सूरज की लालिमा के समान है, जिसके लिए लेखिका को साधुवाद  


अपनी-सी लगती है अतुल्य रिश्तेकी कहानियां

समाज की तमाम विसंगतियों, मानव-जीवन के रूप-रंगों और आधुनिकता की अंधी दौड़ में कुचलते रिश्तों के मर्म को लेखिका ने अपनी कहानियों में बखूबी उकेरा है| बात की जाए, कहानियों के देशकाल और वातावरण की तो लेखिका ने घर-परिवार, आस-पड़ोस के रंग में रंगीं जीवनशैली वाले पात्रों को चुना है, जिससे उनकी रचनायें पाठक को सहज व स्वाभाविक होने के साथ-साथ अपनी-सी लगती है|


लेखन में सधी हुई पकड़

लेखिका ने कहानियों का तानाबाना बेहद सरल व प्रवाहमयी भाषा में बुना है जो कहानियों को एक जीवंत रूप प्रदान करती है| युवा रचनाकारों की रचनाओं में भाषा को लेकर अक्सर यह समस्या देखी जा सकती है कि जब वे सामाजिक परिवेश में मनोभावों को अपनी रचनाओं में प्रस्तुत करने का प्रयास करते है तो ज़्यादातर उनकी भाषा क्लिष्ट होती जाती है, जिससे उनकी रचना में जीवंतता की जगह नीरसता लेने लगती है| लेकिन भावना जी ने अपनी कहानियों में सामाजिक परिवेश और मनोभावों को सरल भाषा में पाठकों के समक्ष प्रस्तुत किया है, जो कहीं-न-कहीं लेखन में उनकी सधी हुई पकड़ को दर्शाता है|


आकर्षक कहानी-शीर्षक

लेखन क्षेत्र की किसी भी रचना में उसका शीर्षक बेहद महत्वपूर्ण होता है, क्योंकि शीर्षक ही पाठक को उस रचना की ओर आकर्षित करता है, जिससे वह उस रचना का पाठक बन पाता  है| कई बार सटीक शीर्षक के अभाव में अच्छी रचनाओं को भी वह सफलता नहीं मिल पाती जिसकी वे सही हकदार होती है| शीर्षक का रचना के लिए न्यायपूर्ण होना बेहद आवश्यक है| ऐसे में, 'अतुल्य रिश्ते' की लेखिका ने सभी कहानियों के शीर्षक भी सजगता के साथ ऐसे चुने है जो एकबार में न केवल पाठक का ध्यान अपनी ओर आकर्षित करते हैं, बल्कि उनके मन में कहानी को लेकर कौतुहल भी उत्पन्न करते हैं|



‘कावेरी की पालकी’ के दो रंग  

कहानी संग्रह में कावेरी की पालकीदूसरों के घरों में काम करने वाली एक ऐसी स्वावलंबी युवती की कहानी है जो जीवन की तमाम कठिनाइयों को पार कर अपनी बेटी को उज्ज्वल भविष्य देने के लिए अपने परिवार और दुनिया से लड़ने को तैयार हो जाती है और अपने जीवन के अंत तक वो अपनी बेटी के बेहतर भविष्य के लिए प्रयासरत रहती है| वहीं दूसरी ओर, कावेरी के गुजर जाने के बाद उसके मालिक-मालिकिन उसकी बेटी के लालन-पालन का जिम्मा खुद लेते है| यह कहानी जहां एक ओर पितृसत्तात्मक समाज में एक महिला और बेटी के रूप में जन्मी स्त्री की तमाम कठिनाइयों को उजागर करती है| वहीं दूसरी ओर, कहानी में मालिक-नौकर से इतर इंसानियत के रिश्ते को दर्शाया गया है, जहां कावेरी के मालिक-मालिकिन बिना किसी भेदभाव के उसकी बेटी को अपनी बेटी की तरह स्वीकार करते हैं|


उपभोगतावादी संस्कृति को बेपर्दा करती स्वार्थ की दुनिया

ऐसे ही लेखिका की एक अन्य कहानी स्वार्थ की दुनियाउपभोगतावादी चकाचौंध में फंसते एक ऐसे इंसान की कहानी है, जो बाजारवाद और आधुनिकता की दौड़ में भागते हुए अपने परिवार, अपने माता-पिता को भूलता चला जाता है| वहीं दूसरी ओर, कहानी में चकाचौंध की गहरी शाम का रंग भी लेखिका ने संवेदनशीलता के साथ प्रस्तुत किया है, जब स्वार्थी दुनिया उस इंसान से अपना स्वार्थ निकालने के बाद किनारा कर लेती है| लेकिन उसके परिवार वाले तब भी उसके साथ होते है| इस कहानी के ज़रिए लेखिका ने स्वार्थ और निस्वार्थ के रिश्तों के बीच के फ़र्क को सटीकता से पाठक तक पहुंचाने का प्रयास किया है, जिसमें में वह काफी हद तक सफल भी हुई है


अनकहा दर्दइस कहानी-संग्रह की मर्मस्पर्शी कहानी है| लेखिका ने कहानी के मुख्य पात्र नट्टू के ज़रिए जहां एक ओर, माता-पिता और अपनी बहन के प्रति उसके कर्तव्यपरायणता को दर्शाया है| वहीं दूसरी ओर, अपने कलेजे के टुकड़े को खो देने के बाद माता-पिता और बहन की तड़प को करीने से अभिव्यक्त किया है|

इसी क्रम में कहानी गर्भ की आवाज़और मुंबई लोकल ट्रेनजैसी सभी कहानियां समाज की कुरीतियों और जीवन के मर्म को प्रस्तुत करती है| कहानी-संग्रह की सभी कहानियां संभावनाशील कथाकार की कोपलें खोलती कहानियां है| हिंदी-साहित्य के मौजूदा दौर में ऐसी रचनायें साहित्य को नई, जीवंत और सार्थक दिशा देने के लिए बेहद आवश्यक है, जिसके लिए भावना शर्मा जैसी युवा-कथाकार का साहित्य जगत में आगमन एक शुभसंकेत भी है        


स्वाती सिंह 



बुधवार, 25 जनवरी 2017

‘बेटी की इज्ज़त और सुंदरता के मानक’ वाली पॉलिटिक्स


‘उनसे ज्यादा बहुत सी सुंदर महिलाएं है, स्टार कैपेंनर हैं| हिरोइन और आर्टिस्ट हैं जो उनसे बेहतर हैं| बीजेपी में खूबसूरत महिलाओं की कमी नहीं हैं, जहां खड़ा कर देंगे, उनसे ज्यादा वोट ला सकती हैं|’ – ये बयान हैं सांसद विनय कटियार का, जो उन्होंने अपने एक इंटरव्यू में दिया|


इस बयान को सुनने के बाद ऐसा लगता है जैसे विनय कटियार कोई सांसद नहीं बल्कि मिस वर्ल्ड कम्पटीशन में सुंदरता के पैमाने जांचने वाले अफसर हो, जिन्हें सुंदरता की बेहद बारीक परख हो|  

उत्तर-भारत में चुनावी बिगुल बज चुका है| हर पार्टी अपनी-अपनी जीत की तैयारी में एड़ी-चोटी एक करने में जुटी है| चुनावी-दौर का यह एक ऐसा समय होता है जब उम्मीदवारों या यूँ कहें प्रतिभागी राजनीतिक पार्टियों को तात्कालिक मुद्दों पर और उनके सुधार को लेकर अपनी नीति पर बात करनी चाहिए| ऐसे में अनुभवी नेताओं द्वारा महिलाओं के लिए बेटी, सुंदरता व इज्जत जैसे शब्दों का इस्तेमाल करके इस तरह की टिप्पणी करना न केवल उनकी संकीर्ण सोच बल्कि देश में राज करने की नीति में तेज़ी से इस्तेमाल में लाये जाने वाले निम्न-स्तरीय हथकंडों को भी दर्शाता है|    

आगामी उत्तर-प्रदेश चुनाव में कांग्रेस की स्टार प्रचारक है प्रियंका गांधी| जिनके खिलाफ़ अपने बयान के ज़रिए राजनीतिक दावं खेलने की कोशिश की विनय कटियार ने|  प्रियंका गांधी ने जिसका जवाब देते हुए कहा कि – ‘वे सही हैं, उनके पास ऐसी महिलाएं हैं| लेकिन क्या बीजेपी मेरे साथियों को इस नज़रिए से देखती है, जो मज़बूत हैं, बहादुर और ख़ूबसूरत महिलाएं हैं? ये महिलाएं जहां हैं, वहां तक पहुंचने के लिए उन्होंने तमाम मुसीबतों का सामना किया है| अगर ऐसा है तो मुझे और भी हंसी आ रही है क्योंकि उन्होंने आधी आबादी के बारे में बीजेपी की सोच को ज़ाहिर कर दिया है|



इस हफ्ते में महिलाओं पर दिया गया यह दूसरा विवादित बयान था| इससे पहले, जेडीयू के नेता शरद यादव ने पटना में कर्पूरी ठाकुर के जन्मदिन के मौके पर कहा कि बेटी की इज्जत जाएगी तो गांव-मोहल्लों की इज्जत जाएगी, वोट एक बार बिक गया तो देश की इज्जत और आने वाला सपना पूरा नहीं हो सकता|’ शरद यादव पहले जेडीयू के नेशनल प्रेसिडेंट रहे हैं| एनडीए के कन्वेयर रहे हैं| ऐसे अनुभवी नेताकी ओर से ऐसा दकियानूसी बयान आना हताश करता है|



कहते है प्यार और जंग में सब जायज़ है| इसी तर्ज पर अगर बात की जाए भारतीय राजनीति की तो इस जुमले की दिशा में बढ़ते राजनीतिज्ञ चुनावी मौसम में अक्सर दिखाई पड़ जाते है| पर यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि अपने प्रतिद्वंदी को परास्त करने या नीचा दिखाने की फ़िराक में नेता खुद को आगे बढ़ाने की बजाए अपने को हर हद से नीचे गिराते जाते है| समय बदल गया| चुनाव के नियम और उन्हें लड़ने-जीतने की नीति बदल गयी| अब आम का नहीं ख़ास या यूँ कहें लीक से हटकर काम करने से, सुर्ख़ियों में बने रहने से अपने वोटों को बढ़ाने का चलन चलता जा रहा है| ऐसे में देश के नेता इस चलन को विपरीत दिशा में आत्मसात करते इस कदर नज़र आते हैं कि किसी भी मुद्दे व दुर्घटना पर उनके विवादित बयान सुर्खियाँ बन जाते है और मुद्दे बेहद बारीक़| आज़ादी के इतने साल बाद कई सरकारें बदली, लेकिन डिजिटल इंडिया के दौर में अपने देश का, समाज का प्रतिनिधित्व करने वाले और हमारे वोटों से चुने गए जननेताओं के ऐसे बयान कई सवाल खड़े देते हैं| सवाल - हमारे समाज की सोच का, समाज के लिए उचित प्रतिनिधि चुनने की क्षमता का और हमारी शिक्षा का| 

गौरतलब है कि सुंदरता अपनी जगह एक सच्चाई है, लेकिन उसकी ओर तारीफ़ भरी निगाहों से देखना एक बात है और उसे ही स्त्री के मूल्यांकन की एकमात्र कसौटी बना लेना बिल्कुल दूसरी बात है| यह वह दौर है जब बात चाहे खेल-जगत की हो या प्रशासनिक सेवा व राजनीति की हर क्षेत्र में महिलाएं बढ़चढ़ कर हिस्सा ले रहीं है और लगातार सफलता के इतिहास में नए पन्ने जोड़ रही है, ऐसे में महिलाओं के अस्तित्व को इंसान की बजाय बेटी-बहु जैसे रिश्तों का नाम लेकर उनके साथ ‘इज्जत’ का पत्थर बांधते हुए उनके अस्तित्व को संबोधित करना निंदनीय है|

इस पूरे प्रकरण में यह समझना होगा कि जब बात महिला पर हो, उन्हें लेकर किसी भी तरह की संकीर्ण मानसिकता पर हो तो इसमें महिलाओं को समझदारी दिखाते हुए पितृसत्ता की सड़ी सोच रखने वाले शख्स पर निशाना साधना चाहिए न की उनकी राजनीतिक पार्टी की महिला प्रतिनिधि पर|

(फेमिनिज्म इन इंडिया में प्रकाशित लेख|)
https://feminisminindia.com/2017/01/26/vinay-katiyar-politics-hindi/

रविवार, 22 जनवरी 2017

बेशकीमती अमृता शेरगिल

सच्चे कलाकार की ये ख़ासियत होती है कि या तो वह समय से बहुत आगे चलता है या समय से बहुत पीछे| शायद यही वजह है कि सच्चा कलाकार अपनी इसी ख़ासियत से ख़ास कलाकार बन जाता है| बीसवीं सदी में एक ऐसा दौर था जब दुनियाभर के कलाकारों में लीक से हटकर काम करने का चलन तेज़ी से बढ़ने लगा था और इस दौर के इसी चलन ने दुनिया को ऐसे कलाकर दिये जिन्होंने इतिहास में अपनी एक अमिट छाप छोड़ दी| 

इन्हीं कलाकारों में से एक है - प्रसिद्ध भारतीय चित्रकार अमृता शेरगिल उर्फ़ फ्रीदा कहलो| अमृता बंगाल कला पुनर्जागरण की दक्ष कलाकार के रूप में कला जगत में प्रतिष्ठित हैं| वह भारत की सबसे महंगी चित्रकार मानी जाती थी| अपने मात्र 28 साल के जीवनकाल में अमृता ने इतिहास में एक ऐसा रंग डाला जिनसे बने इंद्रधनुष आज भी हमें अचंभित करते है|अमृता शेरगिल अपनी वास्तविक ज़िन्दगी में और अपने आर्ट में भी समकालीन कलाकरों से बहुत आगे थी| वह परफेक्शनिस्ट नहीं थी, शायद इसीलिए उनकी सोच का दायरा असीमित था|
 
                                     P.C. Googel


शिमला में गुज़रे अमृता के तीन साल 


अमृता शेरगिल का जन्म 1913 में बुडापेस्ट, हंगरी में हुआ था| उनके पिता उमराव सिंह शेरगिल मजीठिया संस्कृत और पारसी के विद्वान व कुलीन व्यक्ति थे| उनकी माता मेरी अन्तोनेट्टे गोट्समान हंगरी की एक यहूदी ओपेरा गायिका थी| उनकी एक छोटी बहन भी थी जिसका नाम इंद्रा सुन्दरम था| अमृता शेरगिल ने अपना बचपन बुडापेस्ट में व्यतीत किया| 1921 में उनका परिवार शिमला के समीप समरहिल में रहने भारत आ गया| उन्होंने वहां पियानो और वायलिन सीखना शुरू किया| नौ साल की उम्र में वह अपनी बहन के साथ शिमला स्थित माल रोड पर गेटे थियेटर में अपना कार्यक्रम और नाटकों में अभिनय करने लगी थी| मात्र पांच साल की उम्र से ही उन्होंने चित्रकारी करना शुरू कर दिया था और आठ साल की उम्र से उन्होंने चित्रकारी का बकायदा प्रशिक्षण भी लेना शुरू कर दिया था| 1923 में अमृता इटली के मूर्तिकार के सम्पर्क में आई जो उस समय शिमला में ही थे| 1924 में वह उनके साथ इटली लौट गईं|


बाईस साल से भी कम उम्र में तकनीकी चित्रकार बन गई थी अमृता


1934 में यूरोप में रहते हुए भारत आने की तीव्र इच्छा ने उन्हें भारत वापस लौटाया| उन्होंने यह अनुभव किया कि भारतीय चित्रकार बनना ही उनकी नियति है| भारतीय कला परम्परा में नई खोज उन्होंने आरंभ की जो उनकी मृत्यु तक ज़ारी रही| 1936 में वह कर्ल खंडेवाल ने उन्हें अपनी अदम्य आकांक्षा से भारतीय मूल की खोज अभियान को आगे बढ़ाने के लिए प्रोत्साहित किया| वह मुगल, पहाड़ी चित्रकला से और अजंता-एलोरा गुफा की कलाओं से भी बेहद प्रभावित थी| बाईस साल से भी कम उम्र में वह तकनीकी तौर पर चित्रकार बन चुकी थी और असामान्य प्रतिभाशाली कलाकार के लिए आवश्यक सारे गुण उनमें आ चुके थे। पूरी तरह भारतीय न होने के बावजूद वह भारतीय संस्कृति को जानने के लिए बड़ी उत्सुक थी। उनकी प्रारंभिक कलाकृतियों में पेरिस के कुछ कलाकारों का पाश्चात्य प्रभाव साफ झलकता है। जल्दी ही वे भारत लौटीं और अपनी मृत्यु तक भारतीय कला परंपरा की पुन: खोज में जुटी रहीं। भले ही उनकी शिक्षा पेरिस में हुई पर अंततः उनकी तूलिका भारतीय रंग में ही रंगी गई। उनमें छिपी भारतीयता का जीवंत रंग हैं उनके चित्र।

अमृता शेरगिल की चित्रकारी का दूसरा दौर


1938 में अमृता शेरगिल ने अपने हंगरी के चचेरे भाई डॉक्टर विक्टर इगान से विवाह कर लिया| बाद में वह अपने पति के साथ भारत आ गई और उत्तर प्रदेश के गोरखपुर जिले के सरया स्थान पर अपने पति के पैतृक निवास में रहने लगीं| वहां उनकी चित्रकारी का दूसरा दौर शुरू हुआ जो मॉडर्न आर्ट पर उसी तरह प्रभावकारी था जैसा बंगाल स्कूल ऑफ़ आर्ट के रवीन्द्रनाथ टैगोर और जैमिनी रॉय का ‘आर्टिस्ट मूवमेंट’ कलकत्ता ग्रुप व ‘प्रोग्रेसिव आर्टिस्ट ग्रुप’ पर था| कलकत्ता समूह, जो 1943 में एक बड़े रूप में रूपांतरित होकर आरम्भ होना था और प्रोग्रेसिव आर्टिस्ट समूह जिसके संस्थापक फ्रांसिस न्यूटन सूज़ा, ऊराब्रेक गेड, एम-एफ| हुसैन, एस|एच रज़ा थे| उन्होंने मुम्बई में 1948 में इसे परवान चढ़ाया|

पहली बार अमृता शेरगिल के कैनवास में उतरी आम भारतीय महिलाएं


बीसवीं सदी की शुरुआत में भी महिलाओं का अस्तित्व घर की चारहदीवारी तक सीमित था| क्रांतिकारी बदलाव के उस दौर से नदारद भारत की पेशेवर औरतें या तो मजदूर होती या फिर घरेलू नौकर हुआ करती थी| ऐसे में अमृता का अपने काम के लिए किसी भी यूरोपीय देश की तुलना में भारत को महत्व देना उनकी ऊंची एवं अलग सोच को दिखाता है| उस समय पश्चिमी तौर-तरीकों में पली-बढ़ी किसी भी महिला का अपने कार्यक्षेत्र के लिए यह निर्णय किसी आम औरत के लिए संभव नहीं था| अमृता ने अपने कैनवास में अजंता की गुफाएं, दक्षिण भारत की संस्कृति, बनारस को कैनवास पर उतारते-उतारते अनजाने में एक नए युग की शुरुआत कर दी| इसके साथ ही, अमृता ने अपने कैनवास में भारतीय आम-जनजीवन को भी रंगों से जीवंत किया| वहीं पहली बार, रसोई के चूल्हे और घर की चारहदीवारी में कैद भारतीय महिलाओं को वह अपने कैनवास पर लेकर आईं|   

अमृता के कैनवास की वो स्वतंत्र भारतीय महिलाएं
अमृता कलाकार थीं तो संवेदनशील उन्हें होना ही था| लेकिन हर जज्बे में उतनी ही प्रवीणता विरले ही देखने को मिलती है| जितनी खूबसूरत उतनी ही दृढ़, जितनी भावुक उतनी ही व्यवहारिक, जितनी प्रेमल उतनी ही उदासीन, ऐसा स्न्यूजं दुबारा नहीं बना| भारतीय महिलाओं को रचते हुए अमृता कितनी मुखर हो जाती थी इस बात को उनके बनाये चित्रों को देखकर महसूस किया जा सकता है| उन्होंने स्त्री को ऐसा भी रचा जैसे वो उस समय थी और वैसा भी जैसा अमृता खुद उन्हें देखना चाहती थी – ‘स्वतंत्र’| क्लासिकल इंडियन आर्ट को मॉडर्न इंडियन आर्ट की दिशा देने का श्रेय अमृता शेरगिल को ही जाता है|
तुम्हारी अमृता
अमृता शेरगिल को 1976-79 में आर्कियोलोज़िक्ल सर्वे ऑफ़ इंडिया ने नौ दक्ष कलाकरों में रखा और उनकी कृतियों को आर्ट ट्रेज़र के रूप में घोषित किया गया| इनमें से अधिकतर कृतियाँ नई दिल्ली के नेशनल गैलरी ऑफ़ मॉडर्न आर्ट में रखी गई हैं| अमृता के एक चित्र हिल वुमेन पर 1978 में डाक टिकट ज़ारी किया गया| साथ ही ल्युटियेन्स रोड का नाम ‘अमृता शेरगिल मार्ग’ रख दिया गया| 1993 में अमृता, जावेद सिद्धकी के एक उर्दू नाटक की प्रेरणाश्रोत बनीं| ‘तुम्हारी अमृता’ नामक इस नाटक में शबाना आज़मी और फ़ारुख शेख ने काम किया था|
बेशकीमती अमृता शेरगिल
1941 में लाहौर में अपना एक बड़ा प्रदर्शन करने से पहले वह गंभीर रूप से बीमार पड़ गई और कोमा में चली| बाद में 5 दिसंबर 1941 को मध्यरात्रि में उनका देहांत हो गया| अमृता अपने पीछे एक बड़ा कार्य छोड़ गई| उनकी मृत्यु उनके समकालीन चित्रकारों के लिए रहस्यमय ही बनी रही| उन्होंने रंगों से भरे अपने छोटे से जीवन में कला जगत वो दे दिया जिसके आधार पूरब और पश्चिम की कला सालों-साल परखी जा सकती है| इसलिए जो अमृता शेरगिल अपने समय में बे-मोल थीं, अब बेशकीमती हैं|

(फेमिनिज्म इन इंडिया में प्रकाशित लेख|)
 https://feminisminindia.com/2017/01/30/amrita-sher-gil-hindi/




शनिवार, 24 दिसंबर 2016

अनसेफ रिलेशन से ज्यादा सेफ है अबॉर्शन


 मैं अबॉर्शन नहीं चाहती थी, लेकिन मैं बच्चे को एक बेहतर जीवन देने की स्थिति में नहीं थी।     




    सत्रह जून, 2015- यह तारीख दर्ज हैं मेरे जेहन में। इस दिन को मैंने खुद को सशक्त रूप में देखा था। यह वही दिन था, जब मैंने अपना गर्भपात करवाया था। इस फैसले ने मुझे मेरे अस्तित्व से रू-ब-रू कराया था, जब मैंने बिना किसी भावना से परे तर्कों के आधार पर समाज में महिलाओं के महिमंडित स्वरूप के विपरीत अपने जीवन, शरीर और उस भ्रूण के भविष्य के लिए एक निर्णय किया।

वेद और मैं दो साल से रिलेशनशिप में थे। दोनों का करियर उन दिनों भविष्य की सुनहरी मैपिंग पर चलने को तैयार करने था। हम दोनों में बेहद प्यार था या यूं कहें कि ये मेरा एक भ्रम था। बस इसका अहसास मुझे देर से हुआ। एक साल की इंटर्नशिप के लिए जब मैं बंगलुरु गई, तो पीरियड मिस होने पर मैंने प्रेग्नेंसी टेस्ट किया और मुझे पता चला कि मैं प्रेग्नेंट हूं।

मैंने तुरंत वेद को कॉल किया :   

वेद मेरे पीरियड्स मिस हो गए इस मंथ।

ओह! तो तुमने टेस्ट नहीं किया?’

हां किया था, इट वाज पॉजिटिव।

ओह! शिट यार, अच्छा तुम टेंशन न लो। मैं मेडिसिन का इंतजाम करवाता हूं।

मेडिसिन किसलिए?

अबॉर्शन के लिए और किसलिए? देखो,अब तुम लड़की वाला नाटक शुरू मत करो।

मैंने तो कुछ कहा ही नहीं?’

तो करना क्या है तुम्हें?’

तुम टेंशन न लो अब, मैं मैनेज कर लूंगी।

पक्का?’

हां।

ओके बाय, बाद में बात करते हैं।
बाय।


दो मिनट से भी कम की इस बातचीत के बाद दिल की हलचलों की जगह दिमाग ने ले ली। और शुरू हो गया, खुद से तर्कों पर चर्चा। मैं अबॉर्शन नहीं चाहती थी, लेकिन मैं बच्चे को एक बेहतर जीवन देने की स्थिति में नहीं थी। वेद के अचानक बदले व्यवहार ने मुझे हमकी बजाय मैंपर जोर देने के लिए मजबूर किया। वेद से मेरा रिश्ता कहीं-न-कहीं गलत साबित होने लगा था, पर अब मैं एक गलत फैसले से उपजे भ्रूण को गलत भविष्य नहीं देता चाहती थी। और मैंने फैसला कर लिया। यह इतना आसान नहीं था और इस पर अमल करना और भी मुश्किल था।
   
मैंने अपनी सबसे अच्छी दोस्त से अपनी मन की बातें साझा कीं और उसने भी मेरे फैसले का समर्थन करते हुए मेरी मदद की। डॉक्टर ने पहले मेडिसिन से टर्मिनेशन की कोशिश की, लेकिन दुर्भाग्यवश यह सफल न हो सका। नतीजतन मुझे मेडिकल प्रक्रिया से गुजरना पड़ा। रक्त और मांस के टुकड़े मेरे शरीर से निकलते रहे। इस पूरी प्रक्रिया ने मुझे मानसिक और शारीरिक रूप से बेहद कमजोर कर दिया था। वेद के बदले व्यवहार (पीछा छुड़ाने जैसा कुछ) को देख कर भावनाओं के उस जाल से निकलने में मैं थक गई थी।
 
इस दौरान वेद ने एक बार भी मुझसे बात नहीं की। शुरुआत में मुझे इस बात ने बेहद परेशान किया, लेकिन जीवन के उस अहम फैसले में जब हमकी जरूरत हो, तो मैंका होना खुद को सशक्त होने का अहसास कराने लगता है और यही अहसास मेरे साथ चलने लगा था। इस पूरी प्रक्रिया के बाद, बिना कुछ कहे-सुने मेरा और वेद का ब्रेकअप को गया। अबॉर्शन को दो साल बीतने को हैं और मुझे अपने इस फैसले के लिए एक पल के लिए भी पछतावा नहीं हुआ। क्योंकि एक असुरक्षित रिश्ते का कोई भविष्य नहीं होता। 

 

भ्रूण की उपज के लिए केवल नारी जिम्मेदार नहीं। पुरुष भी उतना ही भागीदार होता है। जब वही किनारा करने लगे तो जाहिर है कि वह मातृत्व का तो अपमान कर ही रहा है, उसे आने वाले बच्चे की भी उसे कोई चिंता नहीं। समाज ने महिलाओं को हमेशा एक इंसान समझने से पहले उसके जननीहोने के रूप में स्वीकार किया है। ऐसे में अपने महिमामंडित स्वरूप से हट कर जब महिला अपने इंसान होने के अस्त्तित्व को स्वीकार करती है, तो यह बात समाज की आंखों में चुभने लगती है। यही वजह है कि आधुनिकता के दौर में जब महिलाएं, पुरुषों के साथ कदम से कदम मिला कर चल रही हैं। लिव-इन-रिलेशनशिप में रहना स्वीकार कर रही हैं। अपनी पसंद से शादी करने को समर्थन देती हैं लेकिन गर्भधारण  करने या न करने के सवाल पर उनकी आवाज सन्नाटे में गुम हो जाती है।  

नाकहने या उस पर अमल करने के लिए उन्हें एक पर्दे की आड़ लेनी पड़ती है। क्योंकि मां बनना औरत की जिम्मेदारी है। समाज की यही सोच है। बच्चा पैदा करना औरतों का फर्ज माना गया है मगर फीटस को मार देना या बच्चा पैदा ही न करना उसका सबसे बड़ा गुनाह हो जाता है।

हाल ही में पोप फ्रांसिस ने कहा है- मैं एक बार फिर से जोर देकर कहूंगा कि अबॉर्शन एक पाप है, लेकिन दुनिया में ऐसा कोई पाप नहीं है, जिसकी माफी मांगी जाए और धर्म उसे माफ न कर सके। इयर ऑफ़ मर्सी पर भी यही बात कही जाती है। इयर ऑफ़ मर्सी के बाद ईसाई धर्म में हर 25 साल पर इयर ऑफ़ जुबली मनाया जाता है। इस बार यह दिसंबर 2015 से लेकर नवंबर 2016 तक मनाया गया।

इयर ऑफ़ मर्सी मनाने का मतलब यह था कि हर गुनहगार को माफ किया जाए। क्योंकि जीसस भी यही कहते थे कि माफ कर देने में ही आपका बड़प्पन है। इसी तर्ज पर उन औरतों को भी आसानी से माफी की सुविधा दे दी गई, जो अबॉर्शन करवाती है।
   
भारत में गर्भपात को 1971 में वैध करार दे दिया गया था। मगर सामाजिक तौर पर हर धर्म में इसको लेकर अलग-अलग धारणाएं हैं।
   
ज्यादातर धर्मों में यह पाप है। हम माफी तो गलतियों की मांगते है। मगर कोई भरोसा तोड़ कर स्त्री को गर्भवती बना दे या वह किसी वहशी दरिंदे की शिकार हो जाए, तब भी क्या उसे दूसरे के किए सजा भुगतनी होगी? देश के कानून के मुताबिक कोई भी महिला अगर गर्भपात कराना चाहती है, तो यह उसका अधिकार है। इसके लिए उसका पति या ब्वॉयफ्रेंड भी नहीं रोक सकता। उनसे रजामंदी लेने की भी जरूरत नहीं है। सिर्फ उसकी अपनी सहमति ही काफी है। हालांकि स्त्रियों के गर्भ को धर्म के अधीन मानते की चेष्टा, उनके जननी स्वरूप को सर्वोपरि मानने का ही समर्थन है। मगर वास्तव में यह किस्सा हर मर्दवादी धर्म का है, भले ही उनके नाम अलग-अलग हो। 

(फेमिनिज्म इन इंडिया में प्रकाशित लेख|)
https://feminisminindia.com/2017/01/09/safe-abortion-hindi/


सोमवार, 28 नवंबर 2016

और सबसे ज्यादा खतरनाक है इंटरनेट में आधी दुनिया के लिए हिंसा की साजिश

सदियों से हम जिस दुनिया के बाशिंदे हैं, उसमें समय के बदलाव के साथ मनुष्यों ने अब अपना एक नया राष्ट्रबना लिया है। यह एक ऐसा काल्पनिक राष्ट्र है, जिसकी कोई सरहद नहीं। इसे बने हुए अभी ज्यादा समय भी नहीं बीता है, लेकिन इसकी जनसंख्या अब एक अरब से भी ज्यादा हो चुकी है, जो इसे चीन और भारत के बाद तीसरे सबसे अधिक आबादी वाले देश का दर्जा प्रदान करती है। ऐसा अनुमान लगाया गया है कि इस संख्या तक पहुंचने में आधुनिक मानव को दो लाख वर्ष लगे हैं।
 


वर्तमान समय में इंटरनेट की इस दुनिया ने सूचना व ज्ञान के प्रसार में अहम भूमिका निभाई है। इंटरनेट की सकारात्मक भूमिका को आंकने के लिए किए गए सर्वेक्षणों में ये तथ्य सामने आए हैं कि इंटरनेट वूमन एम्पॉवरमेंट का एक अदृश्य लेकिन सशक्त माध्यम बनता जा रहा है। इस माध्यम से जहां एक ओर महिलाओं के लिए आर्थिक संभावनाओं के द्वार खुले हैं, वहीं दूसरी ओर इसने सोशल मीडिया के जरिए उन्हें अपने विचार अभिव्यक्त करने का एक मंच भी दिया है। हाल ही में हुए कुछ सर्वे बताते हैं कि इंटरनेट उपयोग करने वाली महिलाओं में से आधी ने ऑनलाइन नौकरी के लिए अप्लाई किया और करीब एक तिहाई ने इस माध्यम से अपनी आय में वृद्धि भी की है। 

भारत में तीन साल पहले महिलाओं ने पैल्ली पूला जादा नामक ऑनलाइन स्टोर शुरू किया था, जिसमें अब करीब 200 से अधिक महिलाएं कार्यरत हैं। शोध बताते हैं कि जिन देशों में आय और शिक्षा के क्षेत्र में कम असमानता होती है, वहां बाल मृत्यु दर कम व आर्थिक विकास की दर अधिक होती है। महिलाएं इंटरनेट से प्राप्त मंचों की सहायता से अपने और समाज से जुड़े तमाम मुद्दों पर अपनी बुलंद आवाज पूरी दुनिया को सुनाने में सक्षम हैं। कांगो में महिलाओं ने अपने अनुभव साझा करने के लिए इंटरनेट कैफे खोले और देश के युद्धग्रस्त क्षेत्रों के लिए संयुक्त राज्य अमेरिका के विशेष दूत की नियुक्ति करवाने में सफल हुर्इं। इसी तरह केन्या में महिलाओं ने लैंगिक भेदभाव और हिंसा का सामना करने के लिए इंटरनेट का सहारा लिया। उन्होंने पीड़ितों के समर्थन में ग्रुप बनाया और लीगल चेंज की मांग की।

ब्राजील में महिलाओं ने आई विल नॉट शट अपनामक ऐप बनाया जो महिलाओं पर होने वाले हमलों पर नजर रखता है। बांग्लादेश में महिलाएं मायानामक ऐप से लाभान्वित हो रही हैं। ये ऐप स्वास्थ्य से लेकर कानूनी मामलों तक हर प्रकार के सवालों का जवाब देता है। इससे दूर-दराज के क्षेत्रों की महिलाओं को एक्सपर्ट्स की सलाह मिल जाती है।

इंटरनेट की इस दुनिया ने वो काम कर दिखाया है, जिसे कई देशों की सरकारें नहीं कर पार्इं। यह अब एक ऐसी नई दुनिया बन कर उभरा है, जहां लिंग व जाति से परे सब बराबरहैं और निरंतर विकास की दिशा में एक साथ आगे बढ़ रहे हैं।  

लेकिन दुर्भाग्य की बात है कि अनेक लाभों के बावजूद इंटरनेट तक महिलाओं की पहुंच न केवल पुरुषों की तुलना में बेहद सीमित है बल्कि यह चुनौतीपूर्ण भी है। क्योंकि उन्हें इस दुनिया में भी उन तमाम हिंसाओं का सामना करना पड़ रहा है, जिनसे वे अपने समाज या गली-चौराहों में दो-चार होती हैं। यहां उल्लेखनीय है फेसबुक का एक ग्रुप ब्लोक्स एडवाइस जो मई में शुरू हुआ, उसकी हरकत से आज पूरा सभ्य समाज शर्मसार है। दो लाख पुरुष सदस्यों का यह समूह  बलात्कार की बुराइयों के बारे में नहीं बल्कि उसकी अच्छाइयों पर चर्चा करता है। ये पुरुष बताते हैं कि लड़की का किस तरह रेप किया जाए। किस तरह उसकी मर्जी के खिलाफ उससे एनल सेक्स किया जाए और दूसरे मर्द उन बातों के मजे लेते हैं। उसमें अपने अनुभव जोड़ते हैं।

यह सीक्रेट ग्रुप आस्ट्रेलिया में शुरू हुआ था। इस पेज के बारे में लोगों को तब पता चला, जब राइटर क्लीमेंटीन फोर्ड ने अपने फेसबुक पेज से इस समूह के कुछ स्क्रीनशॉट पोस्ट किए। इस ग्रुप में बहुत कुछ लिखा पाया गया। देखिए उसके दो नमूने: -



-‘औरतों को अगर हमारे साथ सेक्स न करना हो, तो वो हमसे मीटर भर दूर ही रहें।
 
यह पहली बार नहीं है, जब ग्रुप की चर्चा हो रही है। मई में, जब यह ग्रुप शुरू हुआ था, तब मीडिया में इसका जिक्र हुआ था। इसे शुरू करने वाले ब्रोक पॉक ने डेली टेलीग्राफ को बताया था कि यह ग्रुप मर्दों ने एक-दूसरे को सहारा देने के लिए बनाया है। हमने ग्रुप के कुछ नियम बनाए हैं और जो उन्हें तोड़ता है, हम उसे ग्रुप से निकाल देते हैं। हम ये चाहते हैं कि जो बातें पुरुष किसी से नहीं कह पाते, वो आपस में कह सकें। हम टीशर्ट बनाते हैं और उन्हें बेच कर मिले पैसों को चैरिटी में दे देते है।
 
इस घिनौनी सोच से इंटरनेट पर महिलाओं की सुरक्षा का अंदाजा लगाया जा सकता है। यह विचारणीय है कि अगर यह चैरिटी रेप का आनंदलेकर होती है, तो ऐसी चैरिटी की किसी को जरूरत नहीं है। बात यह नहीं कि ये प्रो-रेप बातें किसी सीक्रेट ग्रुप में कही जा रही हैं, तो इनसे कोई नुकसान नहीं होगा। मुद्दा यह है, कि ये कैसी सोच है लोगों की, जिसमें यौन हिंसा पर मजे लिए जाते हैं?

हो सकता है आप कहें कि ये तो सिर्फ बातें हैं। आप ये भी  कह सकते हैं कि ऐसी बातें करने वाले लोगों का यह एक छोटा समूह है। सारे मर्द ऐसे नहीं होते। जी हां, सभी मर्द ऐसे नहीं होते, लेकिन दो लाख की संख्या कोई छोटी नहीं होती। सोचिए, इस सोच वाले मर्द दुनिया में घूम रहे हैं। और जाहिर है कि इंटरनेट के माध्यम से इनकी संख्या बढ़ती ही जाएंगी और ये मर्द हमारे आस-पास ही होंगे, अलग-अलग रूप में। आखिर इनकी भी बेटियां होंगीं, पत्नियां होंगीं। आज जब ये गैंग रेप जैसी अमानवीय यौन हिंसा पर मजे ले सकते हैं, तो कल ये ऐसा सच में होते हुए देख कर भी चुप ही रहेंगे।
 
कोई दो राय नहीं कि सेक्स की फंतासी सभी करते हैं, लेकिन रेप सेक्स नहीं होता। सेक्स यानी संयोग तो वह होता है, जिसमें दोनों पार्टनर की मर्जी हो और दोनों समान रूप से भोग  (आनंद) कर रहे हों। वो नहीं जिसमें मर्द औरत पर जानवर की तरह सवार हो और औरत रो रही हो। यह किसी की भी फंतासी का हिस्सा कैसे हो सकती है? जिस समाज में ऐसे ग्रुप चल रहे हों, वहां की महिलाएं सुरक्षित कैसे महसूस कर सकती हैं।

औरतें कैसे सेफ महसूस कर सकती हैं जब उन्हें लगे कि बसों, पार्कों, सुनसान जगहों या फिर मॉल में उनके सामने खड़ा मर्द उनके साथ रेप करने के बारे में सोच रहा है। और ऐसा न कर पाने की सूरत में किसी वेबसाइट पर उसे अपनी कल्पना में लाकर उसके साथ बलात्कार करेगा। पोर्न साइटों पर रोज-हर पल अस्मत लूटी जाती है। इस रेप कल्चर की सच्चाई सचमुच भयावह है और सबसे ज्यादा डरावनी है इंटरनेट पर आधी दुनिया के लिए ऐसी हिंसा की साजिशें, जो निरंतर चल रही हैं। पुरुषों की कल्पना में हर दिन जिस तरह स्त्रियां रौंदी जा रही हैं, उसकी चिंता करने का नहीं अब उससे कानूनी तरीके से निपटने का वक्त आ गया है। 

स्वाती सिंह