समाज और इतिहास की तलहटी में छिपे और वर्षों से हमारी आँखों से ओझल पहलुओं को सामने लाने की दिशा में एक प्रयास.......प्रतिरोध की ज़मीन....!!
बुधवार, 8 जून 2016
कितना निस्वार्थ था वो ‘अग्नि-युवा’...!
शुक्रवार, 3 जून 2016
एक चना ‘आज़ादी’......!
पेशेवर क्रांतिकारी आपको आये दिन अपने स्वार्थानुसार मुद्दे
के आगे ‘आज़ादी’ जोड़कर नारे लगाते मिलेंगे. इन नारों के साथ होता है खुद के बनाये
इनके संगठनों का नाम, जो इन नारों के प्रायोजक होते है. जिसे देखकर आज़ादी एक ऐसे
चने की तरह लगने लगती है, जिसे ये सभी अपनी स्वार्थ-सिद्धि के लिए भुना रहे है.
डर लगता है माई!
उस दिन सुबह कुछ अखबार और टीवी वाले मेरे घर आये थे. मैंने सुना - मेरी चाची उनसे तेज़ आवाज में कह रही थी कि ‘मैं प्रधानमन्त्री से सवाल करती हूं कि आप कहते हैं बेटी बचाओ, मगर किसलिए, उन्हें घर में बिठाने के लिए? या फिर लोगों से छेड़ने, बलात्कार और हत्या किए जाने के लिए’.
बुधवार, 1 जून 2016
ताकि नर्मदा बचे
बुधवार, 3 फ़रवरी 2016
शहीद भगतसिंह : दास्ताँ एक संघर्षरत व्यक्तित्व की।
सोमवार, 1 फ़रवरी 2016
नेता जी की मौत का गहराता रहस्य या खुलते रहस्य के नए पन्ने?
देश के लिए अपना जीवन न्यौछावर करने वाले सुभाषचंद्र के अस्तित्व और उपलब्धियों को उनकी मौत की उलझती गुत्थी ने मानो घूमिल-सा कर दिया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तरफ से की गयी नई पहल ने इस धुंध के जल्द छटने के आसार तो दिखा दिए। लेकिन ये इंतज़ार अभी और कितना लम्बा है ये कह पाना मुश्किल है।
शहर के संभ्रात परिवार होने के बावजूद भी उनका झुकाव पैसे और शोहरत पाने की तरफ बिल्कुल भी नहीं था। उनके दोस्त उन्हें संयासी कहकर चिढ़ाया करते थे। उनके घर वालों ने उन्हें पढ़ाई के लिए विलायत भेज दिया। जिससे वे आई.सी.एस. की उच्च परीक्षा पास करके बड़ी सरकारी नौकरी करें और अपने परिवार का रुतबा बढ़ाये। उन्होंने आई.सी.एस. की परीक्षा पास करके भी सरकारी नौकरी छोड़ दी।क्योंकि उन्हें विदेशी हुकूमत में कलेक्टर और कमिश्नर बनने की बजाय अपनी मातृभूमि का सेवक बनना मंजूर था। ये कहानी है एक ऐसे फ्रीडम फाइटर सुभाषचन्द्र बोस की, जिन्होंने अपना सर्वस्व हमारी भारतभूमि के नाम न्यौछावर कर दिया।सुभाषचन्द्र बोस भारतीय इतिहास के ऐसे युग पुरुष है जिन्होंने आज़ादी की लड़ाई को एक नया मोड़ दिया। उन्होंने आज़ाद हिन्द फ़ौज का गठन कर अंग्रेजों के छक्के छुड़ा दिए थे। द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान, अंग्रेजों के ख़िलाफ़ लड़ने के लिए, उन्होंने जापान की मदद से आज़ाद हिन्द फ़ौज का गठन किया। उन्होंने जब जय हिन्द का नारा दिया तो ये भारत का राष्ट्रीय नारा बन गया। दुर्भाग्यवश इस आज़ाद भारत को अस्तित्व में लाने वालों में से एक महान व्यक्तित्व की मौत एक ऐसी गुत्थी बनकर रह गयी जो आज भी विवाद का विषय बनी हुई है। जापान में हर साल 14 अगस्त को सुभाषचन्द्र का जन्मदिवस धूमधाम से मनाया जाता है। वहीं भारत में उनके परिवार के लोग ये मानने के लिए तैयार नहीं है कि सुभाषचन्द्र की मौत 1945 में हुई।
23 अगस्त 1945 को टोकियो रेडियो ने बताया कि सैगोन में नेताजी एक बड़े बमवर्षक विमान से आ रहे थे और 18 अगस्त को ताइहोकू हवाई अड्डे के पास उनका विमान दुर्घटनाग्रस्त हो गया। विमान में उनके साथ सवार जापानी जनरल शोदेई, पाइलेट और कुछ लोग मारे गए। नेताजी गंभीर रूप से जल गए थे। उन्हें ताइहोकू सैनिक अस्पताल में ले जाया गया। जहां उन्होंने दम तोड़ दिया। सितम्बर के मध्य में उनकी अस्थियां सञ्चित करके जापान की राजधानी टोकियो के रैंकोजी मन्दिर में रख दी गयी। भारतीय अभिलेखागार से मिले दस्तावेज के अनुसार नेताजी की मौत 18 अगस्त 1945 में हो गयी थी। आज़ादी के बाद भारत सरकार ने इस घटना की जांच करने के लिए 1956 और 1977 में दो बार आयोग नियुक्त किया। दोनों बार यह नतीजा निकला कि नेताजी उस विमान दुर्घटना में ही मारे गए। लेकिन ताइवान देश की सरकार से इस मसले पर दोनों आयोगों ने एक बार भी बात नहीं की।1955 में मनोज कुमार मुखर्जी के नेतृत्व में तीसरा आयोग बनाया गया। 2005 में ताइवान सरकार ने मुख़र्जी आयोग को बता दिया कि 1945 में ताइवान में कोई हवाई जहाज दुर्घटनाग्रस्त हुआ ही नहीं था। लेकिन भारत सरकार ने मुखर्जी आयोग की रिपोर्ट को अस्वीकार कर दिया।
हाल ही में, देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सुभाषचन्द्र बोस की 100 सीक्रेट फ़ाइल की डिजिटल कॉपी जनता के सामने रखी। ये फाइलें नेताजी की मौत से जुड़े कई अनछुए पहलुओं पर प्रकाश डालती है। इन फाइलों को एनएआई (नेशनल अर्चिव्स ऑफ़ इंडिया) में नेता जी के परिवारवालों और केंद्र मंत्री महेश शर्मा और बाबुल सुप्रियो के सामने डिस्प्ले किया गया। पिछले साल अक्टूबर में, प्रधानमन्त्री ने नेताजी के परिवारवालों को ये आश्वासन दिया था कि उनकी सरकार 70 साल पहले गायब हुए सुभाषचन्द्र के रहस्य की गुत्थी सुलझाएगी। प्रधानमन्त्री ने ये आशंका जताते हुए पीटीआई को बताया कि हमें आशंका है कि सुभाषचन्द्र की मौत के रहस्य के जुड़े कई दस्तावेज़ तत्कालीन कॉंग्रेस सरकार में छिपाये गए।
आज़ादी के इतने सालों बाद भी नेताजी की मौत का रहस्य आज भी उतना ही गहरा दिखाई पड़ रहा है, जितना करीब सत्तर साल पहले था। लेकिन देश में प्रधानमन्त्री की ओर से इस दिशा में की गयी इस पहल ने जनता में एक बार फिर विश्वास की अलख जला दी है। अब देखना ये है कि हमें अभी और कितना इंतज़ार करना बाकी है।
स्वाती सिंह
मंगलवार, 5 जनवरी 2016
देश का शौर्य थे : स्वामी विवेकानंद
हमारा देश जिस वक़्त गुलामी की जंजीर में जकड़ा हुआ था, उस वक्त भारतदेश का शौर्य कहे जाना वाला धर्म, शिक्षा, भाषा सभ्यता और आध्यात्मिक बल अपना अस्तित्व खोते जा रहे थे। ऐसे समय में भारतभूमि की सरजमीं पर ऐसे सितारों का उदय हुआ, जिन्होंने भारत के शौर्य को एक बार फिर बुलन्दियों तक पहुंचाया। भारतीय संस्कृति को विश्वस्तर पर पहचान दिलाने वाले उन महान व्यव्क्तित्वों में से एक स्वामी विवेकानंद का आदर्श था -' उठो जागो और तब तक न रुको जब तक मंजिल प्राप्त न हो जाए '। इस आदर्श ने युवाओं के बीच एक ऐसे प्रेरणाश्रोत की जगह कायम की जो आज तक बनी हुई है। साल 1893 में अमेरिका में आयोजित विश्व धर्म सम्मेलन में हिन्दू धर्म का प्रतिनिधित्व करते हुए स्वामी विवेकानंद ने शून्य पर अपना व्याख्यान प्रस्तुत किया। उन्होंने अपने व्याख्यान से ये सिद्ध कर दिया कि भारत बौद्धिक, धार्मिक, चारित्रिक और दार्शनिक क्षेत्र में दुनिया में सबसे आगे है।
स्वामी विवेकानंद का जन्म 12 जनवरी 1863 में कलकत्ता के एक कायस्थ परिवार में हुआ था। उनके बचपन का नाम नरेन्द्रनाथ दत्त था। पिता विश्वनाथ दत्त कलकत्ता हाईकोर्ट के एक प्रसिद्ध वकील थे। विश्वनाथ दत्त पाश्चात्य संस्कृति में विश्वास रखते थे। वे अपने पुत्र नरेंद्र को भी अंग्रेजी पढ़ाकर पाश्चात्य सभ्यता के ढर्रे पर चलाना चाहते थे। लेकिन उनकी माता भुवनेश्वरी देवी धार्मिक विचारों वाली महिला थी। पिता की मृत्यु के बाद घर-गृहस्थी का भार संभालने के बजाय नरेंद्र ने सन्यास लेने का विचार किया। उनके गुरु स्वामी रामकृष्ण परमहंस ने नरेंद्र को सन्यास नहीं लेने की बात कहते हुए कहा कि, 'तुम स्वार्थी हो'। इसपर नरेंद्र ने अपना फैसला त्याग दिया और नौकरी की तलाश में जुट गए। लेकिन उन्हें नौकरी न मिल सकी। साल 1881 में नरेंद्र ने सन्यास ले लिया और अपना नाम विवेकानंद रखा।
मात्र उन्तालीस साल के जीवनकाल में स्वामी विवेकानंद ने अपने प्रभावी कार्यों से ऐसी मिशाल कायम की जो कई सालों तक पीढ़ियों का मार्गदर्शन करते रहेंगे।उन्नीसवीं सदी के आखिरी सालों में विवेकानंद करीब हिंसक क्रांति के जरिये भी देश को आज़ाद कराना चाहते थे। लेकिन उन्हें जल्द ही ये विश्वास हो गया था कि परिस्थितियां उन इरादों के लिए अभी परिपक्व नहीं है। इसके बाद ही विवेकानंद ने 'एकला चलो' की नीति का पालन करते हुए भारत और दुनिया को खंगाल डाला। उन्होंने कहा था कि-' मुझे बहुत से युवा सन्यासी चाहिए। जो भरते के गांवों में फैलकर देशवासियों की सेवा में लगे' । वह पुरोहितवाद, धार्मिक आडम्बरों, कठमुल्लापन और रूढ़ियों के सख्त खिलाफ थे। उन्होंने धर्म को मनुष्य की सेवा के केंद्र में रखकर ही आध्यात्मिक चिंतन किया था।
स्वामी विवेकानंद केवल सन्यासी ही नहीं, बल्कि देशभक्त, वक्ता, विचारक और लेखक भी थे। साल 1899 में कोलकाता में भीषण प्लेग फैला, अस्वस्थ होने के बावजूद उन्होंने पीड़ित लोगों की सेवा की। उन्होंने 1 मई, 1897 में रामकृष्ण मिशन की स्थापना की। ये मिशन, दूसरों की सेवा और परोपकार को कर्मयोग मानता है जो कि हिंदुत्व में प्रतिष्ठित सिद्धांत है। विवेकानंद की ओजपूर्ण वाणी ने भारतीय जनता और राष्ट्रवादियों में एक नई शक्ति का संचार किया। उनका कहना था- 'संसार का इतिहास उन थोड़े से व्यक्तियों का इतिहास है जिनमें आत्मविश्वास था। यह विश्वास देवत्व को प्रकट कर देता था, तब व्यक्ति कुछ भी कर सकता है, सर्वसमर्थ हो जाता है। असफलता तभी प्रकट होती है जब तुम शक्ति को अभिव्यक्त करने का प्रयास नहीं करते। जिस क्षण व्यक्ति या राष्ट्र आत्मविश्वास खो देता है उसी क्षण उसकी मृत्यु हो जाती है'।
स्वाती सिंह




