सोमवार, 13 अप्रैल 2015

बेड़ियाँ भी न रोक सकी नन्हें बुकर को.....!

मई की तपती दोपहरी में, जब एक दिन नन्हा बुकर कोयले की खान में काम कर रहा था, तभी उसने दो लोगों को बात करते हुए सुना। वे लोग हैम्पटन के किसी स्कूल के बारे में बातें कर रहे थे, जो अश्वेत लोगों के लिए बनाया गया स्कूल था । उस समय अश्वेत लोगों का स्कूल बनना असम्भव सी बात थी। लेकिन ये खबर सुनते ही नन्हें बुकर के चेहरे पर मुस्कान आ गई और मानो उसके सपनों को उड़ान भरने के लिए पर मिल गए हो। नन्हें बुकर ने आव देखा न ताव सीधे हैम्पटन जाने का निर्णय किया। नन्हें बुकर के इस इरादे को देखकर उसके माता-पिता को ख़ुशी हुई। इसके साथ ही विरासत में मिली दासता के कारण असहाय माँ-बाप बेटे की मदद न कर पाने के कारण दुःखी थे।

आखिर सन् 1872 में, बुकर ने अकेले वहां जाने का फैसला किया। बुकर के नन्हें कदम और खाली जेब एक लम्बे सफर को तय करने के लिए एक बड़ी चुनौती थे। इन सबके बावजूद, बुकर पूरे आत्मविश्वास के साथ निकल पड़ा। उसकी गर्वीली चाल ऐसी लग रही थी जैसे पराजय उसके जीवन के शब्दकोश में ही न हो।            

   ढेर सारी कठिनाइयों को पार कर जब नन्हा बुकर थका हुआ वहां पहुंचा, तो उसका मुरझाया चेहरा और गन्दे कपड़े अध्यापिका को प्रभावित नहीं कर पाए । लेकिन बुकर ने अपना धैर्य और साहस नहीं छोड़ा । वे अवसर की प्रतीक्षा करने लगे । थोड़ी देर बाद अध्यापिका ने उनसे संगीत कक्ष की सफाई करने को कहा । इस आदेश को बुकर ने एक बड़े अवसर के रूप में स्वीकार किया और बिना किसी शिकायत के कमरे में सफाई में लग गए । बुकर के लिए अवसर अपने जीवन को बदलने के बन्द किवाड़ की कुंजी की तरह लगा। नतीजन पूरी निष्ठा के साथ बुकर के नन्हे हाथ कमरे की सफाई में लग गए। जब अध्यापिका ने निरीक्षण किया तो उन्हें कमरे में धूल का एक भी कण नहीं मिला । उनकी कार्यनिष्ठा से वे बेहद प्रसन्न हुई और उन्हें प्रवेश की स्वीकृति दी ।                         

  इस स्वीकृति ने कोयले की खान में काम करने वाले एक बंधुआ अश्वेत बच्चे की जिन्दगी ऐसी बदली कि उनका नाम इतिहास के निर्माता के रूप में स्वर्णिम अक्षरों में उभरा । बुकर.टी वाशिंगटन विश्व इतिहास में दर्ज़ एक ऐसा नाम है जिन्होंने न केवल एक इतिहास रचा, बल्कि लोगों के जीवन से लेकर जेहन तक की दासता से मुक्ति भी दिलवायी ।                             

  बुकर का जन्म सन् 1850 में, वर्जिनिया के एक गरीब-नीग्रो-बंधुआँ परिवार में हुआ । जन्म से मिली ये दासता बुकर को कभी मंजूर नहीं थी, इसलिए उन्होंने इसे खत्म करने के लिए शिक्षा का मार्ग चुना और निकल पड़े पांच सौ मील की दूरी पर पैदल हैम्पटन की ओर अपनी किस्मत आजमाने । सन् 1881 में हैम्पटन में 'तुसकेगी नार्मल एंड इंडस्ट्रियल इंस्टिट्यूट' की स्थापना हुई, जो नीग्रो लोगों के लिए बनाया गया पहला विश्वविद्यालय था । बुकर ने जीवन की तमाम कठिनाइयों का बहादुरी से सामना किया और अपनी मेहनत और लगन से अपने जीवन में सफलता का मुकाम पाया।

   बुकर ने सन् 1896 में हार्वर्ड यूनिवर्सिटी से मास्टर्स की डिग्री ली और सन् 1901 में उन्हें दार्थमोअर्ट कॉलेज की ओर से 'डॉक्टरेट' की उपाधि से सम्मानित किया गया । सन् 1901 में बुकर ने 'अप फ्रॉम स्लेवरी', नामक आत्मकथा लिखी, जिसके बाद अमेरिका के राष्ट्रपति थिओडोर रूज़वेल्ट ने व्हाइट हाउस में सम्मानित किया । बुकर पहले अश्वेत नागरिक बने, जिन्हें ये सम्मान प्राप्त हुआ । इसके साथ-ही-साथ बुकर राष्ट्रपति के सलाहकार भी नियुक्त किए गए । सन् 1915 में बुकर को तुसकेगी इंस्टिट्यूट का निदेशक भी नियुक्त किया गया  और सन् 1940 में प्रसिद्ध अमेरिकन सिरिज में उनके नाम का यूएस पोस्टेज स्टाम्प भी जारी करके उन्हें सम्मानित किया गया ।     

    बुकर.टी.वाशिंगटन ने मजबूत इरादों की जमीन से उपजी उस पहल से ना केवल इतिहास में एक नया अध्याय जोड़ा, बल्कि बरसों से दासता की जंजीर में जकड़े समाज को भी आज़ादी दिलवायी । बराक ओबामा अमेरिका के पहले अश्वेत राष्ट्रपति बने, जिनकी पृष्ठभूमि अगर बनी तो इसे बुकर के संघर्ष का परिणाम कहा जा सकता है।यूँ तो बुकर , सन् 1915 में इस दुनिया से रुख्सत हो गए, लेकिन आज भी  शिक्षा जगत में उनके योगदान को याद किया जाता है। एक महान व्यक्तित्व के रूप में बुकर को मिसाल माना जाता है।     
         
 बुकर के जीवन-संघर्ष की कहानी हर युवा के लिए एक प्रेरणास्रोत है । नन्ही-सी उम्र में परिस्थिति के विरुद्ध उनका दृढ कदम और पांच सौ मील का सफर बिना कुछ खाए-पिए पैदल करना । इतना ही नहीं, इन सबके बाद विद्यालय में प्रवेश परीक्षा में सफाई का काम करना । इतनी धीरता और कर्मठता ही मामूली इंसान को एक ऐसा महान व्यक्तित्व बनाती है, जिनकी संघर्ष कथा न केवल प्रेरणा देती है बल्कि उनका आत्मविश्वास और अनवरत संघर्ष पूरी दुनिया को गौरवान्वित करता है।

 स्वाती सिंह

शनिवार, 11 अप्रैल 2015

अवसाद :- एक समस्या के कारण से निवारण तक ।

   " भारत में अवसाद के उपचार मौजूद होने के बाद भी अवसाद का एक महामारी की तरह प्रसार।"   

         वर्ष 2014 में हुए सर्वेक्षण के अनुसार भारत हैप्पी प्लेनेट इंडेक्स में अपने नागरिकों को लंबा और खुशहाल जीवन देने में भारत 151 देशों में चौथे स्थान पर था । अर्थव्यवस्था विकसित हो रही है, भुगतान सन्तुलन सुधर रहा है और राजस्व घाटा कम हो रहा है । 2014 के मॉन्स्टर सैलरी इंडेक्स के मुताबिक , 64 फीसदी से भी अधिक भारतीय अपनी नौकरी, काम और निजी जीवन के संतुलन से खुश है ।              

           लेकिन ये उल्लास और खुशहाली अपने भीतर एक गहरा राज छिपाए है । अवसाद की विकरालता, जिसकी कोई साफ़ वजह नजर नहीं आती । ये रोग दिमाग पर कब्ज़ा कर बैठता है, व्यक्तित्व को खा जाता है और जीवन को नष्ट कर देता  है।                            

           भारत में आज चार महिला में से एक महिला और दस में से एक पुरुष अवसाद का शिकार है, जिसमें 67 प्रतिशत पीड़ितों में आत्महत्या की प्रवृति देखी गई और 17 प्रतिशत ने तो इसकी कोशिश भी की और 45 प्रतिशत किशोर अवसाद के लक्षणों के बाद शराब और मादक दवाओं की शरण लेते है  ( स्रोत : मेन्टल हेल्थ: अ वर्ल्ड ऑफ डिप्रेशन,नेचर,2014; मेंटल हेल्थ रिसर्च इन इंडिया, आईसीएमआर ) । 'डेली' ( डिसेबिलिटी एडजेस्टेड लाइफ ईयर ऑर हेल्दी लाइफ लॉस्ट टु प्रिमिच्योर डेथ ऑर डिसेबिलिटी ) में आंका जाने वाला ये रोग 1990 में ही बड़े रोगों का चौथा बड़ा कारण था । विश्व स्वास्थ्य संगठन का कहना है कि 2020 तक यह सबसे बड़ा कारण बन जाएगा । अवसाद के और भी कई पहलू है । हर चार मिनट में एक व्यक्ति आत्महत्या करता है ।     

                भारत में 30 साल से कम उम्र के युवाओं की मौत तो आत्महत्या की वजह से होती है । एक दशक पहले की तुलना में अब ये आकड़ा चार गुना हो गया है । नई दिल्ली के फोर्टिस हैल्थकेयर ऐंड बिहेवियरल साइंसेस के डायरेक्टर डा. समीर पारेख कहते है, " आत्महत्या के समय किसी-न-किसी मानसिक विकार से पीड़ित होते है । इनमे भी 75 के पास अवसाद की वजह मामूली ही होती है ।"                    

           पिछले साल इंटरनेशनल साइकोएनेलिटिक एसोसिएशन ने एक किताब में मनोविश्लेषण के एशियाई टाइगरों- चीन, जापान, दक्षिण कोरिया, ताइवान और भारत का जश्न मनाया था । इस किताब में बताया गया था कि सिगमंड फ्रायड ने मुश्किल से 100 साल पहले जिसे 'टाकिंग क्योर' यानी बातचीत से निदान कहा था, पूरब के देशों में वह किस तरह जबरदस्त ताकत बन गया है । इन पाँचों में भारत ही वह देश है, जहां मनोविश्लेषण का लंबा इतिहास रहा है । यहां यह विधा उतनी ही प्राचीन है, जितनी पशिचम में है । भारतीय मनोविश्लेषण के जनक गिरीन्द्र शेखर बोस (1887-1953) फ्रायड के समकालीन थे । लेकिन दुर्भाग्यवश आज भारत में 3,500 पेशेवर मनोरोग चिकित्सक है, बल्कि देश को लगभग 11,500 चिकित्सकों की ज़रूरत है । हैरत की बात है कि वैज्ञानिकों को इस बारे में बहुत कम जानकारी है कि आखिर हताशा होती ही क्यों है ? जिसके लिए भारत में मनोविश्लेषण और मनोचिकित्सा के विस्तार की आवश्यकता है ।         
     
              इसके साथ ही साथ, निजी समस्याओं के बारे में खामोश रहने की हमारी संस्कृति तब और भी बुरी तरह से उभरकर आती है, जब हम भारत की भीषण सामाजिक-आर्थिक गैरबरबरियों से दो-चार होते है । हमारे दिमाग में यह बात बैठी हुई है कि चारों तरफ इतनी भीषण गरीबी से घिरे होने पर अच्छे-भले, खाते-पीते लोगों को अपनी निजी समस्याओं के बारे में जबान खोले बगैर शांति से रहना चाहिए । मनोवैज्ञानिक समस्याएं और इनका इजहार आत्ममुग्धता नहीं, बल्कि आत्मरति माना जाता है, जो बिगड़ैलों, नवधनाढ्यों और 'विदेशियों' को ही शोभा देते है ।      

                  आज अवसाद भारत में दबे पाँव तेज़ी से मानव-जीवन को अपने चपेट में ले रहा है, जो ना केवल एक स्वास्थ्य से जुड़ी समस्या है। बल्कि इसके परिणाम:- आत्महत्या व मानव जीवन के साथ-साथ पारिवारिक जीवन बढ़ते बिखराव सामाजिक समस्या के रूप में सामने आ रही है । इसमें सबसे आश्चर्य की बात ये है कि अवसाद का इलाज़ भी उपलब्ध होने के बावजूद ये लोगों से कोसों दूर मालूम पड़ता है । अतः शोधकर्ति ने अवसाद की समस्या और इसके इलाज के बीच की बढ़ती दूरी की समस्या को इस संगोष्टी के लिए चयनित किया ।      
    
              अब यदि बात की जाय अवसाद के कारणों की तो उपयुक्त विवेचन के आधार पर हम अवसाद की समस्या के प्रमुख कारणों को निम्न बिंदुओं में लिख सकते है :-भारत में अवसाद की समस्या बढ़ने के प्रमुख कारण :- 
1- जागरूकता का अभाव,
2- मनोविज्ञान के प्रति लोगों की भ्रान्ति,
3- मनोचिकित्सकों की संख्या में कमी एवं मनोविज्ञान के सिमित क्षेत्र,
4- सामाजिक-सांस्कृतिक संघर्ष व एकाकीपन ।

         साहित्य अवलोकन :-

           फ्रेंच समाजशास्त्री इमाइल दुर्खीम ने सन् 1897 में ' सुसाइड ' नाम की एक पुस्तक प्रकाशित करवायी । जिसके अंतर्गत दुर्खीम ने सुसाइड, यानी आत्महत्या पर फ़्रांस के प्रोटेस्टेंट और कैथोलिकों को केस स्टडी के तौर पर चुना । दुर्खीम ने अपने अध्ययन के निष्कर्ष में, आत्महत्या के कारणों पर चर्चा की, जिसके अंतर्गत उन्होंने बताया कि आत्महत्या कोई अचानक से लिया गया फैसला नहीं होता, बल्कि ये एक लम्बी प्रक्रिया का निष्कर्ष होता है । जिसे हम अवसाद कहते है । उन्होंने अवसाद के कारणों में सामाजिक कारकों को प्रमुख पाया । जिसमें ज़्यादातर मनुष्य सामाजिक व सांस्कृतिक वैचारिक- संघर्ष के दौरान अवसाद का शिकार होते चले जाते है और अवसाद के अंतिम चरण में आत्महत्या जैसी समस्या का शिकार हो जाते है ।     

          इसके अतिरिक्त, अवसाद के सन्दर्भ में महत्वपूर्ण मानी जाने वाला सिद्धांत- ' Cognitive Theory of Depression ', जिसे डॉ. आरोन बेक ने प्रतिपादित किया । इस सिद्धान्त में बेक का मानना है कि, अवसाद का प्रमुख कारण सामाजिक व सास्कृतिक संघर्ष होता है । और 'आत्महत्या' जैसी घटनाएं अवसाद के दुष्परिणाम के रूप में हमारे सामने आती है ।

  समस्या का समाधान :-

                  भारत में उपचार उपलब्ध होने के बावजूद अवसाद एक महामारी की तरह मानव-जीवन जो अपनी चपेट में ले रहा । जिससे ये पता चलता है कि अवसाद की समस्या और इसके उपचार में एक गहरी फांक है जो पीड़ितों के जीवन को बचाने में सफल नहीं हो पा रही । जब हम इस समस्या के कारणों का विश्लेषण करने पर हम निम्नवत कुछ कारकों को प्रमुख पाते है :-

1- जागरूकता का अभाव,
2- मनोचिकिसक के प्रति लोगों की भ्रान्ति,
3- मनोवैज्ञानिकों की कमी व मनोविज्ञान का सीमित क्षेत्र 
4- सामाजिक-सांस्कृतिक संघर्ष व एकाकीपन ।       
             यदि इन प्रमुख कारणों पर प्रभावी रूप से कार्य किया जाए तो इस समस्या से निजात पाया जा सकता है । अतः उपयुक्त कारणों का विवरण तथा इनके उपायों का विवरण इस प्रकार से है :-

                                                    जागरूकता का अभाव :-              

    कई सर्वेक्षणों में ये पाया गया है कि भारतीय लोगों में अवसाद के प्रति उनकी कम जागरूकता इसे बढ़ावा दे रही है । यदि बात की जाए अवसाद के लक्षणों की तो प्राथमिक चरण में अवसाद के लक्षण बेहद आम नजर आते है, जैसे -भूख न लगना, नींद न आना या ज़्यादा नींद आना या मन एकाग्रचित न कर पाना इत्यादि ।द्वितीयक चरण में, थकान महसूस करना, अपने पसन्दीदा कार्य में मन न लगना, चिड़चिड़ापन व नकारात्मक दृष्टिकोण में बढ़ोतरी इत्यादि।  आमतौर पर लोग इन लक्षणों को पूरी तरह नजरअंदाज कर देते है ।             
            अवसाद के उपचार के प्रति लोगों में जागरूकता का अभाव देखने को मिलता है । उन्हें इस बात की सही जानकारी नहीं होती कि क्या अवसाद का कोई इलाज़ है या नही, अगर है तो किस स्थान पर ? अतः जागरूकता के अभाव में हम दो प्रमुख पहलू पाते है :-
1- अवसाद के लक्षणों के बारे में जानकारी ना होना,
2- अवसाद के उपचार के बारे में जानकारी ना होना।

समाधान:-                                     
  
             टीवी, रेडियो, अखबार व सार्वजनिक स्थानों पर पोस्टर के माध्यम से लोगों को अवसाद के लक्षणों के बारे जानकारी दी जा सकती है । जिस प्रकार अन्य बिमारियों के बारे में लोगों को जागरूक किया गया, जैसे -टीबी की बीमारी । टीवी, रेडियो, अखबार और पोस्टरों के माध्यम से लोगों टीबी के बारे में जागरूक किया गया और बताया गया कि, अगर आपको दो हफ्ते ज़्यादा खांसी आ रही और दवाई लेने के बावज़ूद आपको आराम नहीं है तो ये टीबी का लक्षण हो सकता है । इसके साथ-ही-साथ प्रचार में टीबी के लिए बनाये गए डॉट्स सेण्टर के बारे में भी जानकारी दी गयी, जहां वे टीबी की जांच के साथ -ही-साथ इसका इलाज भी करवा सकते है ।              
              ठीक इसी तरह अवसाद के लक्षणों और इसके उपचार सम्बंधित जानकारियों को प्रचार के माध्यम से लोगों तक पहुचना होगा ।

                                               मनोचिकित्सक के प्रति भ्रान्ति :-            

      भारत के सन्दर्भ में मनोचिकित्सक को लेकर कई भ्रांतियां प्रचलित है, जो लोगों को मनोचिकित्सक से दूर और अवसाद की समस्या को बढ़ाने का काम करती है । भारत में ज़्यादातर लोग मनोचिकित्सक के पास जाने में संकोच महसूस करते है, जिसका मूल कारण है- मनोविज्ञान के प्रति उनकी गलत धारणा । आमतौर पर लोग मनोचिकित्सकों को पागलों का डॉक्टर समझते है और उनका मानना होता है कि मनोचिकित्सक के पास जाने वाला हर मरीज किसी न किसी पागलपन से ग्रसित है । ये धारणा लोगो को मनोचिकित्सकों के प्रति हमेशा बनी रहने वाली भ्रान्ति के रूप में घर कर जाती है, जिससे लोग उपचार उपलब्ध होते हुए भी अवसाद का शिकार होते चले जाते है ।

समाधान :-         

            मनोचिकित्सकों के प्रति लोगों की इस भ्रान्ति का प्रभावी माध्यम है- संचार । भारत के सन्दर्भ में मनोचिकित्सकों की आमजन में प्रचलित इस छवि (पागलों का डॉक्टर) बनने के कारकों को विश्लेषित किया जाए तो हम सिनेमा और टीवी सीरियलों को इस दृष्टिकोण को विकसित करने में अहम पाते है । जहां ज़्यादातर सिनेमा व टीवी सीरियलों में मनोचिकिसकों को पागलपन का इलाज़ करते मात्र फिल्माया गया है।    
               अतः सिनेमा और टीवी सीरियलों में मनोचिकित्सकों की इस छवि को सुधारा जाना आवश्यक है । और इसके साथ-ही-साथ मनोचिकित्सकों को विभिन्न विज्ञापनों के ज़रिए एक ऐसे किरेदार में प्रस्तुत करने की आवश्यता है जिससे लोग उनसे आसानी से जुड़ पाएं । जैसा की भारत सरकार द्वारा ग्रामीण क्षेत्रों में चलाई गई योजना के अंर्तगत नर्सों को 'आंगनबाड़ी बहनजी' के र्रूप में प्रस्तुत किया गया, जिनसे लोग बड़ी आसानी से जुड़ पाते है । ठीक उसी तरह मनोचिकित्सकों को विज्ञापनों के माध्यम से  'सलाहकार मित्र' जैसे किरेदार के तौर में प्रचारित करना आवश्यक है । जिससे समाज उनके प्रति बनी हुई,उस संकीर्ण मानसिकता को समाप्त किया जा सके ।
             
                                                    मनोवैज्ञानिकों की कमी :-    

      वर्तमान समय में भारत में कुल 3,500 पेशेवर मनोचिकित्सक है और जरूरत कुल 11,500 चिकित्सकों की है । मनोवैज्ञानिकों की कमी के कारकों में से एक प्रमुख कारक है- मेडिकल की इस शाखा में छात्रों का रुझान कम होना । मनोचिकित्सा में उन्हें उस रुतबे और शौहरत का अनुभव नहीं लगता जो अन्य शाखाओं में उपलब्ध है । इसका सीधा का कारण है मनोविज्ञान का दिखायी पड़ने वाला सीमित क्षेत्र ।

समाधान :-       

           मेडिकल की पढ़ाई करने वाले छात्रों के समक्ष मनोचिकित्सा में उनके भविष्य के अपार अवसरों के अवगत कराना अनिवार्य है । जिसके लिए कालेजों में सेमिनार व वर्कशाप का आयोजन किया जाना चाहिए । सेमिनार में जहां छात्रों के समक्ष मनोविज्ञान में छिपे अवसरों से अवगत कराना और मनोविज्ञान के प्रति उनके मन की भ्रांतियों को अलग किया जाना चाहिए । वहीं वर्कशाप के माध्यम से मनोविज्ञान में तकनीक और विज्ञान की पृष्ठभूमि पर मानसिक हलचलों को समझने की विधियों का परिचय कराना चाहिए । जिससे छात्रों का मनोविज्ञान के प्रति रुझान बढ़ेगा ।   
                  इसके साथ ही साथ, सरकार को मनोविज्ञान सम्बंधित अलग-अलग रिसर्च सेण्टर और ट्रीटमेंट सेण्टर खुलवाने होंगे, जिससे मनोविज्ञान के सीमित क्षेत्र को और वृहत किया जा सके और रोजगार के अवसर भी खुल सके ।

                                सामाजिक-सांस्कृतिक संघर्ष और एकाकीपन :-      

      अवसाद पर हुए अधिकांश शोधों में ये पाया गया कि मानव-जीवन का सामाजिक-सास्कृतिक जीवन में संघर्ष और एकाकीपन अवसाद के प्रमुख कारणों में से एक है । कहते है कि संसार की हर चीज क्षणिक है, जहां हर पल तेज़ी से बदलाव होता रहता है । लेकिन कई बार हमारा मन इन बदलावों के साथ कदम से कदम मिला कर नहीं चल पाता और नतीजन वह समाज और संस्कृति के बदलते पहलुओं को लिए लम्बे मानसिक संघर्ष के दौर में चला जाता है, जहां कुछ समय के बाद वो खुद को अकेला महसूस करने लगता है । ऐसी अवस्था अक्सर उस वक़्त होती है जब अपनी बातों को किसी को समझा नही पाते या फिर समझौता करने की प्रवित्ति लिए जीवन-व्यतीत करते है ।

समाधान :-        

          अवसाद के इलाजों में काउन्सलिंग को महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है । जो एक सफल इलाज़ भी है, जिसके अंतर्गत बातचीत के माध्यम से पीड़ित की मानसिक उलझनों का निदान किया जाता है । लेकिन अक्सर ऐसा पाया गया है कि लोग अपनी पहचान बताने में परेशानी महसूस करते है और कई बार गम्भीर स्तिथि होने के बावजूद वे इलाज के लिए नही जाते ।        
                 इस समस्या के लिए एक फ्री हेल्पलाइन चलाई जानी चाहिए । जिसमें पीड़ित इंसान बिना अपनी पहचान बताये अपनी काउन्सलिंग करवा सके । जिस तरह भारत में किसान काल सेण्टर जैसी सुविधाओं के माध्यम से किसानों की मदद की जा रही है । ठीक उसी तरह अवसाद के लिए भी ऐसी हेल्पलाइन चलाई जानी चाहिए ।

 नीति का क्रियान्वयन :-      

              इस सम्पूर्ण नीति को पब्लिक व प्राइवेट सेक्टरों द्वारा क्रियावन्वित किया जाना चाहिए । जिसमें पब्लिक सेक्टर द्वारा नीति निर्माण की प्रक्रिया हो और प्राइवेट सेक्टर को वे कार्यक्षेत्र की दक्षता को ध्यान में रखते हुए, उन्हें कॉन्ट्रैक्ट दें ।

नीति का निर्देशन :-

     
               सम्पूर्ण कार्यक्रम नीति का निर्देशन सरकारी स्वास्थ्य संस्थानों के साथ-साथ अंतर्राष्ट्रीय स्वास्थ्य संगठनों के निर्देशन में किया जाना चाहिए ।     

स्वाती सिंह

मंगलवार, 31 मार्च 2015

सॅटॅलाइट चैनलों की प्रसिद्ध होती : एक संस्कृति

आजकल अंतरिक्ष में जहां दिन दोगुनी और रात चौगुनी के हिसाब से सॅटॅलाइट चैनलों की तादाद बढ़ रही है। वहीं दूसरी ओर दक्षिण-एशिया में इन सॅटॅलाइट चैनलों के प्रोग्राम की संख्या बढ़ती जा रही है। इन कार्यक्रमों में, खासतौर पर अंग्रेजी भाषा के कार्यक्रम का प्रसारण अंतर्राष्ट्रीय दर्शकों को ध्यान में रखकर किया जाता है। जिसके दर्शक अधिकांशतः अभिजात वर्ग से है। इस लेख में हमलोग अंतर्राष्ट्रीय कार्यक्रमों का भारतीय दर्शकों पर पड़ने वाले प्रभाव और उनकी प्रतिक्रियाओं के बारे में चर्चा करेंगे। जिसमें हम मुखयतः-जी, सोनी और स्टार जैसे अंतर्राष्ट्रीय चैनलों को केंद्रित करेंगे । इसके अतिरिक्त, लेख में यह भी विश्लेषण करने की कोशिश करेंगे कि आखिर नयी भारतीय मध्यम वर्गीय परिवारों के बीच लोकप्रिय होते ये सॅटॅलाइट प्रोग्राम किन बिंदुओं पर अंतर्राष्ट्र और राष्ट्र को मिलाते है। और इसके साथ ही इन कार्यक्रमों के प्रचार व प्रायोजकों के लिए कौन-कौन से विचार व उद्देश्य निर्धारित किये जाते है।             

    कई साल पहले, भारतीय मध्यमवर्गीय दर्शकों के समक्ष एकमात्र चैनल था-'दूदर्शन'। या यूँ कहें कि भारतीय मध्यमवर्गीय घरों की टीवी पर दूरदर्शन का एकाधिकार था। जिसमें  मुख्य रूप से भारतीय राज्यों में, राजनीति व विकास की विचारधारा के सास्कृतिक रूप से प्रचार पर जोर दिया गया। जिसके बाद,नए सॅटॅलाइट चैनलों ने दूरदर्शन के इस एकाधिकार को खत्म किया। और अपने दर्शकों को अपने ग्राहक के रूप में स्वीकार किया व उनकी व्यक्तिगत पसन्द के आधार पर कई अवसर के द्वार खोल दिए। जो एक नयी विचारधारा के रूप में उभरा। जहां उन्होंने राज्य से सम्बंधित पूर्व निर्धारित मानकों को मानने की बजाय, समाज के पुराने रीति-रिवाज़ों से हटकर भारतीय व पूर्वी देशों के विचारों के समन्वय से बने नए विचारों को स्थान देना शुरू किया। जिससे अब भारतीय मध्यम वर्गीय दर्शक अब सिर्फ दर्शक नहीं, बल्कि ग्राहक बनते गए। जिससे जनता में निरन्तर बदलाव एक चलन के तौर पर चल पड़ा।                  

                'मेरी आवाज़ सुनो ', 'अंताक्षरी' और 'सा रे गा मा पा' जैसे कार्यक्रम भारतीय युवाओं के बीच प्रसिद्ध होने लगे। इसके साथ ही, 'आप की अदालत' जैसे कार्यक्रम ने लोगों की भागीदारी सिर्फ दर्शक होने के साथ-साथ प्रश्नकर्ता के रूप में भी उन्हें स्थान दिया। और उनके सवालों और विचारों को सामने लाने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की। सबीना किदवई (शिक्षिका) का मानना है कि, सॅटॅलाइट टीवी ने लोगों को अधिक से अधिक अभिव्यक्ति के अवसर दिए है। प्रसिद्ध सॅटॅलाइट चैनलों ने पौराणिकता से ज़्यादा नए विचार या यूँ कहें कि आधुनिक विचारों और इनके विभिन्न पहलुओं पर ज़्यादा ध्यान दिया है। जिससे भारतीय मध्यमवर्गीय दर्शकों का रुझान दूरदर्शन से सॅटॅलाइट टीवी की ओर तेज़ी से पलायन कर रहा है।          

                 यदि बात की जाय अंग्रेजी भाषा की बढ़ती या यूँ कहें बनी हुई लोकप्रियता की तो  दक्षिण एशियाई देशों में आज भी अंग्रेजी सीखने और बोलने का चलन काफी प्रचलित है। नतीजन मध्यम वर्गीय अंग्रेजी तालीम हासिल करने वाले परिवारों ने सॅटॅलाइट के इस चलन को अंग्रेजी भाषा की तरह तवज्जों देते हुए, इसे स्वीकार किया। जिसमें भारतीय मध्यमवर्गीय लोगों ने अंग्रेजी समाचार के लिए दूरदर्शन से सीधे स्टार, बीबीसी और सीएनएन की तरफ पलायन कर लिया।  मनोरंजन के लिए उन्हें जी व सोनी जैसे चैनल मिले, तो वहीं खेलकूद की खबरों के लिए स्टार और इएसपीयन और विज्ञान व पर्यावरण के लिए डिस्कवरी जैसे चैनल मिले। दर्शकों की रूचि के अनुसार उपलब्ध चैनल और इनकी विशेषज्ञता इस पलायन का मूल कारण बनी। इसके साथ ही, विभिन्न सर्वेक्षणों के माध्यम से इन सॅटॅलाइट चैनलों ने लोगों की रूचि का भी अध्ययन किया। जिनके आधार पर इन्होंने अपनी केंद्रित जनता के अनुसार कार्यक्रमों का निर्माण कार्य शुरू किया। इन चैनलों में, स्टार न्यूज़, स्टार मूवीज, सीएनएन और बीबीसी प्रमुख है। इस तरह, भारत व अन्य दक्षिण एशियाई देशों में अंग्रेजी भाषायी मध्यमवर्ग के बीच सॅटॅलाइट चैनलों के चलन ने रफ़्तार पकड़ ली।             

              सॅटॅलाइट चैनलों की बढ़ती लोकप्रियता ने दक्षिण एशिया में एम टीवी ने एक नयी पीढ़ी को जन्म दिया है। जो एम टीवी पीढ़ी कहलाती है।युवाओं के बीच एम टीवी का चलन काफी प्रचलित है। ये चैनल युवाओं पर केंद्रित कार्यक्रमों को प्रसारित करता है, जिसने युवाओं के बीच इसके लोकप्रियता के ग्राफ को काफी ऊँचा कर दिया है। फैशन से लेकर रॉक गानों तक और रियलिटी शो से लेकर युवाओं पर केंद्रित कार्यक्रमों ने एक नए चलन को बढ़ावा दिया है। आश्चर्य की बात ये है कि इस चैनल की लोकप्रियता कई पिछड़े राज्यों में भी देखने को मिल रही है। भाषा-क्षेत्र के भेदभाव से ऊपर एम टीवी ने युवाओं को एक संस्कृति में जोड़ रही है।              

             सॅटॅलाइट-संस्कृति ने हिंदी व अंग्रेजी भाषा से परे इनदोनो के मेल से एक नयी भाषा का सृजन किया। जिसे 'हिंगलिश' कहा जाता है। जिसमें भाषा के एकाधिकार की जगह इस समन्यवित भाषा को स्थान दिया गया। जिससे सन्देशों के संचार के रास्ते में भाषा कोई रोड़ा ना बने और लोग आसानी से इन कार्यक्रमों से खुद को जोड़ पाएं।        

              भाषा के इस समन्वय ने नगरीय दर्शकों के बीच हिंदी सॅटॅलाइट मनोरंजन चैनलों के प्रचलन को भी बढ़ावा दिया है। जिसका सीधा प्रभाव हम हिंदी सिनेमा की बढ़ती लोकप्रियता के रूप में देख सकते है। जैसा की हमलोग जानते है, कि सिनेमा हमेशा से भाषा, व्यवहार और लोगों की जीवन-शैली में अपना गहरा प्रभाव छोड़ती है। और सॅटॅलाइट चैनलों के इस प्रभाव ने लोगों के जीवन-आदर्श तक पर गहरा प्रभाव डाला है। सिनेमा व अन्य टीवी सीरियलों की कहानी के पात्र अब लोगों के जीवन-आदर्शों की जगह लेने लगे है। क्योंकि सॅटॅलाइट चैनलों ने ऐसे कार्यक्रमों को बढ़ावा दिया जिससे लोग खुद को जोड़कर देख सके जो आदर्श-निर्माण से लेकर भाषा जैसे जीवन से जुड़े अनेक पहलुओं को प्रभावित करती है।            
 
             सॅटॅलाइट कार्यक्रमों में बच्चों और महिला प्रस्तुतिकरण को बढ़ावा मिला। इन चैनलों में एक ओर जहां बच्चों को केंद्रित करते हुए कार्टून चैनलों का प्रचलन बढ़ता जा रहा है। वहीं दूसरी ओर, महिला केंद्रित कार्यक्रमों का प्रचलन भी तेज़ी से बढ़ रहा है। बच्चों पर केंद्रित कार्यक्रम एक ओर जहां उन्हें मनोरंजन के साथ शिक्षित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे है। वहीं दूसरी ओर ये चैनल बच्चों को खेल के मैदान से दूर घण्टों टीवी के सामने बैठे रहने पर मजबूर कर रहे। या यूँ कहें की ये बच्चों को टीवी का लती बना रहा है, जो आज अधिकांश अभिभावकों के चिंता का सबब बन चुका है। महिलाओं के सन्दर्भ में, ये कार्यक्रम वर्तमान समय में महिलाओं से जुड़े कई ऐसे पहलुओं को उजागर करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे है जो बरसों से छिपे रहे या जानबूझ कर छिपाये गए। लेकिन कहीं न कहीं बाजार की इस अंधी दौड़ में महिलाओं का प्रदर्शन एक वस्तु की तरह किया जाने लगा। जिस आधार पर कई नारीवादी इन सॅटॅलाइट चैनलों में महिला प्रस्तुतिकरण की आलोचना करते है।     

           सॅटॅलाइट चैनलों में प्रचार एजेंसी महत्वपूर्ण भूमिका अदा करते है, जिसकी वजह से कई बार ये रचनात्मकता पर हावी होती दिखती है। इस तरह सॅटॅलाइट चैनल अब दक्षिण एशिया में मनोरंजन,खबर,खेल और प्रचार के क्षेत्र में एक  बाज़ार स्थापित कर चुका है।

स्वाती सिंह