बुधवार, 19 अक्टूबर 2016

मेरे सशक्त रूप को तुम ‘ये गाली’ देते हो तो ‘मुझे कबूल है’ - टू बी अ बिच

आज महिलाओं ने अपना सशक्त मुकाम हासिल करने के लिए कितनी कुर्बानी दी है, मालूम भी है आपको? रात-रात भर जाग कर पढ़ी हैं वो। उसने खुद को काबिल बनाया है। उसके संघर्ष में घर के पुरुषों ने ही साथ नहीं दिया। वह अकेली लड़ी है आगे बढ़ने के लिए। फिल्म, फैशन वर्ल्ड और कॉरपोरेट से लेकर साहित्य व मीडिया तक, पुलिस और प्रशासनिक सेवाओं से लेकर मेडिकल और इंजीयिरिंग तक वे अपनी प्रतिभा से पहुंची हैं। आज जब वह अपने हिस्से की दुनिया जीना चाहती हैं, तो पुरुष उन्हें पितृसत्ता की आड़ में कठपुतली की तरह नचाना चाहते हैं। कमाल है....! 




अब इसे महज संयोग कहा जाए या साजिश, एक पितृसत्तात्मक समाज में जो पुरुष का होता है वह वैध है, वरना बाकी सब अवैध है। खासकर महिलाओं के संदर्भ में। लड़की ने अगर पितृसत्ता के अनुसार शादी की, तो वह ‘शरीफ’ और अगर नहीं की तो ‘छिनाल’ या ‘चरित्रहीन’। शारीरिक-संबंध अगर सिर्फ पति के साथ हुआ तो लड़की ‘पतिव्रता’ और अगर नहीं हुआ या कभी किसी और के साथ रहा हो, तो लड़की ‘रंडी’ या ‘वेश्या’। अगर यही पुरुष करे तो कोई बात नहीं। संस्कार, इज्जत, कायदे या तहज़ीब के नाम पर क्या खूब रची गई है न ये मर्दों की दुनिया....! 

   यहां सब का आधार बपौती है। यानी बाप-भाई या पुरुष रिश्तेदार जो कहें या करें, वह सही। और बंधन तोड़ कर एक मुकाम हासिल कर रहीं परिवार और समाज की महिलाएं अपने मन की करें, तो भइया वह सब गलत है। आप करो तो सब ठीक और हम करें तो संदेहास्पद चरित्र। शायद यही वजह है कि इन मर्दों ने अपनी भड़ास निकालने के लिए अधिकांश गालियां महिलाओं पर ही केंद्रित करके बनाई गई है। यहां तक कि उन्होंने अपनी मां और बहन को भी इसमें नहीं बख्शा। 

   इसी तर्ज पर, आजकल लड़कियों के संदर्भ में कथित कुलीन लोगों में एक गाली- ‘बिच’ और अपने देसी समाज में ‘कुतिया’ के इस्तेमाल का चलन तेजी से बढ़ा है। घर में तो ये आम है। मगर सोशल मीडिया हो या सड़क-चौराहा, कॉलेज-कैंपस हो या आॅफिस का कैफेटेरिया, बड़ी आसानी के किसी लड़की को ‘कुतिया’ घोषित कर दिया जाता है। और क्या आपको पता है कि ‘कुतिया’ घोषित किए जाने के मानक क्या हैं? अगर नहीं जानते तो आइए हम बताते हैं - 

 कुतिया हो तुम ‘अगर’-


   -मर्दों की गढ़ी हुई ‘संस्कारी औरत’ की परिभाषा में तुम खरी नहीं उतरती।



   -चीज़ों को देखने-सोचने का तुम्हारा एक अपना नज़रिया है या यूं कहें कि तुम्हें किसी की बातें यूं ही मान लेना पसंद नहीं।


   -तुम अपने आपको वो इंसान समझती हो, जो सोचने-समझने और उन पर कायम रहने की हरसंभव कोशिश करता है। मगर ऐसा है नहीं।


   -तुम्हारे पास बहुत सारे काम हैं करने को। इसलिए तुम्हारे पास किसी के बहाने सुनने का वक्त नहीं है।



    -स्तन व हार्मोन्स के होते हुए भी तुम्हारे जीवन के कुछ लक्ष्य हैं और तुम महत्त्वाकांक्षी हो। गोया कि सिर्फ पुरुषों की ही होती है यौन आकंक्षा, तुम्हारी नहीं। 


   -तुमने अपने पिछले बॉयफ्रेंड या पति को इसलिए छोड़ दिया क्योंकि उसने तुम्हारे ‘आत्मसम्मान’ को ठेस पहुंचाई थी।



  -तुम अपनी ज़िंदगी अपनी शर्तों पर जीना चाहती हो।


  -तुम्हें समझौते के नाम पर अपने आत्म को खत्म करते हुए जीना गवारा नहीं है।



हाल ही में, अभिनेत्री, निर्देशक और रॉकस्टार श्रुति हसन ने ‘अनब्लश’ के बैनर तले एक विडियो ‘बी द बिच’ लांच किया। इस विडियो में श्रुति ने महिलाओं की उन खासियत को उजागर किया, जो उन्हें मर्दों के अनुसार ‘बिच’ यानी कुतिया बनाती है। कहा जाता है कि नियति बदली जा सकती है अगर नीयत बदल दी जाए, मगर पुरुषों के इस माइंडसेट को बदलना इतना आसान नहीं है। 



  आज हम बड़ी आसानी से कह देते हैं कि महिलाएं तो अब बहुत सशक्त हो चुकी हैं, तभी तो हर क्षेत्र में आगे बढ़ रही हैं। मगर इसके लिए उसने कितनी कुर्बानी दी है, मालूम भी है आपको?। रात-रात भर जाग कर पढ़ी हैं वो। उसने खुद को काबिल बनाया है। उसके संघर्ष में पुरुषों ने साथ नहीं दिया। वे अकेली लड़ी हैं आगे बढ़ने के लिए। फिल्म, फैशन वर्ल्ड और कॉरपोरेट से लेकर साहित्य व मीडिया तक, पुलिस और प्रशासनिक सेवाओं से लेकर मेडिकल और इंजीयिरिंग तक वे अपनी प्रतिभा से पहुंची हैं। आज जब वह अपने हिस्से की दुनिया जीना चाहती हैं, तो पुरुष उन्हें पितृसत्ता की आड़ में कठपुतली की तरह नचाना चाहते हैं। कमाल है! मेहनत हम करें और जीवन भर के लिए आपके गुलाम हो जाएं.....! न भाई ये हम से न होगा। जो करना है कर लो, हम अपने मन की जिएंगे।      


औरतों को कुतिया कहने वालो को कहो-थैंक यू


   सवाल यह है कि आप....जी हां पितृसत्तात्मक सोच रखने वाले आपलोगों से ... चाहे औरत हों या मर्द, ..... दोनों ही कितने तैयार हैं- हमारे सशक्त रूप को स्वीकार करने के लिए? अब आप कहेंगे कि भला हमने कब रोका है? तो जनाब ये बताइए कि ऐसे शब्दों से उन्हें आगे बढ़ने भी तो नहीं दिया है। आपने गाली देकर महिला सशक्तीकरण के लिए बरसों चले संघर्ष का मजाक ही तो उड़ाया है। 



बहरहाल, इन सब हालातों से निपटने के लिए अपने विडियो से श्रुति ने नजरिए को बदलने की बात कही है, जो वर्तमान परिप्रेक्ष्य में एकदम सही और सटीक है। अब किसी की सोच तो बदली नहीं जा सकती, इसलिए क्यों न हम अपने ही नजरिए को बदल लें। क्योंकि हमें आगे बढ़ना है, रुकना नही है। ....... तो अगर कोई हमें ‘बिच’ कहे, तो हम उन्हें हंस कर जवाब दें - थैंक यू।

स्वाती सिंह 


शुक्रवार, 14 अक्टूबर 2016

औरतों को चाहिए ‘स्वतंत्र इंसान’ की पहचान

उसे चाहिए अपनी भूमिका के साथ जीने का हक



    यह मामला है इस बात की सामाजिक स्वीकृति और गारंटी का कि मानव-जाति का जो हिस्सा आधी दुनिया कहलाता है, उसे स्वतंत्र पहचान और भूमिका के साथ औरत होकर जीने का हक है। किसी भी स्थिति में उसे इस अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता। यह स्वीकृति और गारंटी किसी भी सभ्य समाज की कसौटी है। क्या भारतीय समाज आधुनिकता के इस कथित दौर में इतना परिपक्व हो पाया है कि वह आधी दुनिया से बराबरी के स्तर पर वह सब कुछ बांट सके, जिस पर वह बरसों से अपना अधिकार जमाए बैठा है? भारतीय महिलाओं की दशा और दिशा पर एक समाजशास्त्रीय विवेचन-  


   पहली कहानी -

     नेहा ने जहर नहीं खाया, पर उसके दिल-दिमाग में इतना जहर भर चुका है कि अब वह अपने घर-परिवार से, अपने अड़ोस-पड़ोस से, अपने देश-समाज से और यहां तक कि अपने-आप से नफरत करती है, डरती है, और अपनी मां के अलावा किसी से कोई बात करना पसंद नहीं करती। पिछले साल वह कालेज से लौट रही थी, तो राह चलती लड़कियों पर फिकरे कसने वाले लफंगों की एक जमात ने उसे घेरा, नोचा-खसोटा, जलील किया और फिर रातों-रात उसे एक हंसती-खेलती लड़की से सामूहिक बलात्कार की एक छोटी-सी खबर बना डाला। ‘हां, पुलिस में रिपोर्ट की थी, लेकिन वे हमेशा यही कहते रहे कि बदमाशों को पहचानो, उसका नाम बताओ, तब हम कार्रवाई करेंगे।’ यह बोलते-बोलते उसकी मां सिसक पड़ती है, लेकिन नेहा पर इस सिसकी का कोई असर नहीं होता। वह अब एक औरत नहीं, खौफजदा इंसान है। नेहा जिंदा है, मगर वह मर चुकी है।


   दूसरी कहानी -

  आरती इस्तेमाल नहीं होना चाहती थी, तो जानते हैं, उसके साथ क्या हुआ? उसे एक दिन जहर खा लेना पड़ा। बच्ची थी, तभी उसके मां-बाप गुजर गए। दूर के रिश्ते के निसंतान चाचा-चाची ने उसे पाला-पोसा, कुछ पढ़ाया-लिखाया और बमुश्किल सत्रह साल की छोटी सी उम्र में उसका ब्याह कर दिया। पति और ससुर दोनों शराबी-कबाबी और दोनों चाहें कि वह दोनों की हवस मिटाए। आरती ने पहले बचने की कोशिश की, फिर भाग निकली। चाचा-चाची ने बड़ी मुश्किल से पिंड छुड़ाया। फिर उसे एक और लड़के के पल्ले  बांध दिया। यह लड़का पहले से शादीशुदा था, इसलिए जल्दी ही छोड़ कर चलता बना। चाचा-चाची तीसरी बार किसी से उसकी बात चला रहे थे, तब उसे पता चला कि असल में उसे बेच रहे थे और इससे पहले भी दो बार उसे बेचा ही गया था। फिर तो उसकी छाती ऐसी फटी की जिंदगी का सारा मोह जाता रहा। आरती ने अपने लिए मौत को चुन लिया।


   तीसरी कहानी -

  ‘ईश्वर की कृपा’ है कि तान्या को ऐसी कोई परेशानी नहीं झेलनी पड़ी। वह सरकारी क्षेत्र के एक बैंक में असिस्टेंट है। पति सेक्रेटेरियट में काम करते है। सब ठीक-ठाक चल रहा है। घर में बहुत समृद्धि नहीं तो कोई अभाव भी नहीं है, लेकिन कहां मिलता है मन का सुकून और तन को आराम। दिन भर दफ्तर में काम करो, सुबह-शाम नाश्ता-खाना तैयार करो। बच्चे के पोतड़े धोओ और फिर पतिदेव के नखरे उठाओ। जिंदगी न हुई, एक बवाल हो गई, लेकिन दिक्कत इन सबसे नहीं, बच्चे को लेकर है। तीन-चार साल का बच्चा है, जिसे दिन भर के लिए पड़ोसी के यहां छोड़ना पड़ता है। वैसे, पड़ोसन भली महिला है और वह खुद बच्चे के लिए खाना-दूध सब करके आती है, पर ‘दिन भर उसके लिए मन कलपता रहता है, तरह-तरह के बुरे खयाल आते रहते है। कभी-कभी मन करता है कि नौकरी छोड़ दूं।’ वह कहती है- ‘मगर हमारा परिवार बड़ा है। गांव में सास-ससुर-ननद-देवर सब रहते है। उनकी मदद करें न करें, ननद की शादी के लिए पैसा जुटाना ही पड़ेगा न।’



समय बदल गया। सरकारें भी बदल गर्इं, पर औरतों की यह तस्वीर नहीं बदली। वह आज भी इन्हीं समस्याओं से घिरी नजर आती है- समाज में, साहित्य में, सिनेमा में। हर कहीं, उसके नाम बहुत हैं, मगर पहचान कुछ नहीं। उसकी सूरतें अनेक हैं, पर औकात कुछ नहीं। आज महिलाओं के सामाजिक अस्तित्व के सामने यही भौतिक और भावनात्मक विनाश के खतरे हैं, जिन्होंने आज महिलाओं की सामाजिक सुरक्षा के सवाल का नारीवादी आंदोलन का सबसे प्रमुख प्रश्न बना दिया है।

   महिलाओं की सामाजिक सुरक्षा इस नारीवादी संघर्ष का एक ज्वलंत मुद्दा है। आज की ठोस स्थितियों में तात्कालिक सुरक्षा का मतलब है : महिलाओं की उन तमाम समस्याओं का समाधान। ये समस्याएं न सुलझने की वजह से एक स्वतंत्र सामाजिक हस्ती के रूप में महिलाओं का सिर उठा कर जीना नामुमकिन होता जा रहा है।

   1. इन समस्याओं में सबसे पहली चीज है - अशिक्षा। इसने औरतों को जीवन और जगत की ठोस वास्तविकताओं से दूर कर रखा है।

  2. शिक्षा के बाद सबसे उपेक्षित क्षेत्र है - रोजगार। इसके बगैर औरत की आर्थिक स्वतंत्रता की बात भी नहीं सोची जा सकती। एक तो हमारे समाज की सोच ही इतनी पिछड़ी और पुरुषमुखी है कि पढ़ी-लिखी औरतों की शिक्षा भी पति की सामाजिक हैसियत जताने के काम आ जाती है। 

   3. अब कामकाजी महिलाओं की एक श्रेणी उभरी भी है, तो भी उसकी आर्थिक स्वतंत्रता कतई बेमानी है। सिर्फ इसलिए नहीं कि हमारे परिवार उनकी कमाई पर उनके व्यक्तिगत अधिकार को दिल से मान्यता देना नहीं जानते, बल्कि इसलिए भी कि बच्चों के पालन-पोषण की चिंता में वस्तुत: उनका कोई हिस्सेदार नहीं होता।


आर्थिक दृष्टि से दो और महत्त्वपूर्ण समस्याएं हैं, जो औरत को दोयम दर्जे का नागरिक बनाए रखने में बड़ी भूमिका निभाती है। इनमें से एक है - घरेलू कामकाज, जिसके बगैर शांति से जीवन चलना नामुमकिन है। महिलाएं न केवल इस जिम्मेदारी को निभाने में अकेली हैं, बल्कि उनकी इसके बिना मोल की मेहनत को सामाजिक उत्पादन के क्षेत्र में कोई योगदान तक नहीं समझा जाता। दूसरा मसला है - पारिवारिक संपत्ति का, जिसमें तमाम कानूनों के बावजूद पुरुषों को महिलाओं के साथ हिस्सा बांटना रास नहीं आता है। 

   आज जब हम महिलाओं की सामाजिक सुरक्षा की बात करते हैं, तो उसका मतलब होता है- महिलाओं के आर्थिक और आर्थिकेतर उत्पीड़न के इन तमाम रूपों के खात्मे की गारंटी। उनकी तमाम तात्कालिक ज़रूरतों के निदान वास्ते एकमुश्त कार्यक्रम को लागू करने के लिए महिलाओं के प्रतिनिधि संगठनों के नियंत्रण में काम करने वाली सामाजिक एजंसियों का निर्माण। हिंसक तत्वों से महिलाओं की रक्षा के लिए और महिला-संबंधी मामले-मुकदमों से हाथों-हाथ निपटने के लिए विशेष दस्ते का गठन। 



यह न तो महिलाओं पर समाज की दया का मामला है और न ही पीड़ित महिला-समुदाय के प्रति उत्पीड़क पितृसत्ता की दरियादिली का। यह मामला है इस बात की सामाजिक स्वीकृति और गारंटी का कि मानव-जाति का जो हिस्सा आधी दुनिया कहलाता है, उसे स्वतंत्र पहचान और भूमिका के साथ औरत होकर जीने का हक है और किसी भी स्थिति में उसे इस अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता। यह स्वीकृति और गारंटी किसी भी सभ्य समाज की कसौटी है। क्या भारतीय समाज आधुनिकता के इस कथित दौर में इतना परिपक्व हो पाया है कि वह आधी दुनिया से बराबरी के स्तर पर वह सब कुछ बांट सके, जिस पर वह बरसों से अपना अधिकार जमाए बैठा है?  


स्वाती सिंह 

शनिवार, 8 अक्टूबर 2016

आजादी की लड़ाई में आधी दुनिया

भारतीय स्वतंत्रता का इतिहास जिन अमर शहीदों के लहू से लिखा गया, उनमें देश की आधी आबादी ने भी अपना योगदान दिया था। दुर्भाग्य से उनमें से ज्यादातर को भुला दिया गया| चंद महिला स्वाधीनता सेनानियों की ही चर्चा इतिहास के पन्नों और स्कूली पाठ्यक्रमों में होती है। मगर इस तथ्य से भी इनकार नहीं किया जा सकता कि आजादी की लड़ाई में कंधे से कंधा मिला कर जिन गुमनाम महिलाओं ने सहयोग और समर्थन दिया, उनका तो कहीं जिक्र नहीं मिलता। फिलहाल, यहां चर्चा उन महिला स्वतंत्रता सेनानियों की, जिन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ संघर्ष में अपनी अमिट छाप छोड़ी।



वो थीं 1942 की झांसी की रानी : अरुणा आसफ अली


अरुणा आसफ अली का जन्म 1909 में एक बंगाली परिवार में हुआ। उन्होंने 1930 के नमक सत्याग्रह से स्वतंत्रता संग्राम में कदम रखा। गांधी-इरविन संधि के कुछ महीनों बाद उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया था। इसके बाद 1941 में अरुणा को फिर से व्यक्तिगत सत्याग्रह के आरोप में गिरफ्तार किया गया। जब सभी प्रमुख नेताओं को 8 अगस्त को गिरफ्तार कर लिया गया, तब 9 अगस्त, 1942 को गोवालिया टैंक मैदान में तिरंगा फहराने वाली वह पहली शख्सियत थी। 26 सितंबर, 1942 को उनकी सारी संपत्ति जब्त कर ली गई। उन्हें अपनी सभी चीजें वापस पाने के लिए आत्मसमर्पण करने के लिए कहा गया। जब उन्होंने इनकार कर दिया, तो उनके सभी सामान बेच दिए गए।





अरुणा आसफ अली ने राममनोहर लोहिया के साथ मिल कर लोगों में जागरूकता पैदा करने के लिए ‘इंकलाब पत्र’ मुहिम की शुरुआत की। इसका परिणाम यह हुआ कि कई सरकारी कर्मचारी अपनी नौकरी छोड़ कर और हजारों की संख्या में छात्र अपनी पढ़ाई छोड़ कर स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े और इसका नेतृत्व अरुणा ने किया। उन्हें ‘1942 की झांसी की रानी’ पुकारा जाने लगा। अरुणा आसफ अली दिल्ली नगर निगम की पहली महिला महापौर भी बनीं। उन्होंने ‘लिंक एंड पेट्रियट’ नाम से पत्रिका भी निकाली, जिससे उनके कार्यों को मान्यता मिली। अरुणा जी  को कई राष्ट्रीय और अंतराष्ट्रीय पुरस्कारों से भी नवाजा गया।


स्वतंत्र भारत की पहली महिला मुख्यमंत्री : सुचेता कृपलानी


सुचेता कृपलानी का जन्म 1908 में अंबाला में हुआ। लाहौर में प्राथमिक शिक्षा के बाद उन्होंने एमए की डिग्री दिल्ली विश्विद्यालय से ली। बचपन से ही उन्होंने स्वतंत्र भारत में रहने का सपना देखा था। उन्होंने 1932 में, सार्वजनिक सेवाओं में प्रवेश किया और 1939 में राजनीति में शामिल हुर्इं। जनसेवा के उनके कार्यों से प्रभावित होकर 1940 में गांधीजी ने उन्हें व्यक्तिगत सत्याग्रह के लिए चुना। इसके लिए उन्हें गिरफ्तारी तक देनी पड़ी।

सुचेता ने 1942-43 में भूमिगत होकर अपना कार्य जारी रखा। उन्होंने आल इंडिया महिला कांग्रेस की नींव रखी, जिसका काम महिलाओं को देश के वास्ते संघर्ष करने के लिए प्रेरित करना था। इस महत्त्वपूर्ण कार्य के लिए उन्होंने 1942 में एक ‘भूमिगत स्वयंसेवक बल’ का भी गठन किया। इससे महिलाओं को ड्रिल, हथियार संचालन, प्राथमिक उपचार और आत्मरक्षा तकनीकों में प्रशिक्षित किया जाता था। दो साल बाद 1944 में उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। 



जेल से बाहर आने पर 1945 में सुचेताजी ने अपना अधिकतर समय समाज-कार्यों के लिए समर्पित का दिया। उन्होंने 1946 में पूर्वी बंगाल में सांप्रदायिक दंगों और 1947 में पंजाब दंगों की पीड़ित महिलाओं को शरण दी। वे मार्च 1963 से मार्च 1967 तक उत्तर-प्रदेश की मुख्यमंत्री रहीं। वे स्वतंत्र भारत की पहली महिला मुख्यमंत्री थीं।


वह नन्हीं परी एक दिन बनी दुर्गा : दुर्गा भाभी


इलाहाबाद कलक्ट्रेट के नाज़िर पंडित बांके बिहारी नागर के घर 7 अक्तूबर 1907 को उनकी नन्हीं परी दुर्गावती का जन्म हुआ। दुर्गा ने साल 1918 में पांचवी कक्षा पास की और उसी साल उनका विवाह आगरा में रहने वाले भगवती चरण वोहरा से कर दिया गया। शुरुआती दिनों में दुर्गा एक स्थान से दूसरे स्थान तक सूचनाएं पहुंचाने का काम करती थीं। 16 नवंबर 1926 में लाहौर में नौजवान भारत सभा ने भाषण का आयोजन किया, जहां वह सभा की सक्रिय सदस्य के तौर पर सामने आर्इं। दुर्गावती ने 17 दिसंबर 1928 को भगत सिंह और सुखदेव ने सांडर्स की हत्या की। हत्या के बाद ब्रिटिश पुलिस उनकी खोज में जुट गई। जिसके बाद ये दोनों दुर्गावती के पास पहुंचे और उन्होंने बड़ी सतर्कता से भगत और सुखदेव को सुरक्षित कलकत्ता पहुंचाने की योजना बनाई। नौ अक्तूबर 1930 को दुर्गा भाभी ने गवर्नर हैली पर गोली चला दी, जिसमें गवर्नर तो बच गया पर सैनिक अधिकारी टेलर घायल हो गया। मुंबई के पुलिस कमिश्नर को भी दुर्गा भाभी ने गोली मारी थी। जिसके बाद से अंग्रेज सरकार उनकी तलाश कर रही थी। 



इसके बाद दुर्गा भाभी लाहौर चली गईं, जहां पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार कर तीन साल तक नजरबंद रखा। फरारी, गिरफ्तारी और रिहाई का यह सिलसिला 1931 से 1935 तक चलता रहा। अंत में लाहौर से जिला बदर किए जाने के बाद दुर्गा भाभी 1935 में गाजियाबाद स्थित प्यारेलाल कन्या विद्यालय में अध्यापिका की नौकरी करने लगीं। कुछ समय बाद फिर दिल्ली चली गर्इं और कांग्रेस के लिए काम करने लगीं। मगर कांग्रेस रास न आने के पर उन्होंने इसे 1937 में छोड़ दिया। साल  1939 में इन्होंने मद्रास जाकर मारिया मांटेसरी से प्रशिक्षण लिया और 1940 में लखनऊ में कैंट रोड के एक मकान में पांच बच्चों के साथ मांटेसरी स्कूल खोला। आज भी यह विद्यालय लखनऊ में मांटेसरी इंटर कालेज के नाम से जाना जाता है। 14 अक्तूबर, 1999 को दुर्गा भाभी ने गाजियाबाद में अंतिम सांस ली। 

 
उन्हें आजादी के नाम मिली उम्रकैद : कल्पना दत्त


कल्पना दत्त बंगाल में उच्च-शिक्षा ले रही थीं। उन्हें अंग्रेजी शासन और उनकी भाषा से बैर था। वे स्कूल की प्रतिज्ञा तक को बदलना चाहती थीं, इसे वह ‘परमेश्वर और राजा के प्रति वफादार होने’ के स्थान पर ‘परमेश्वर और देश के प्रति वफादार होना’ करना चाहती थीं। अपनी शिक्षा पूरी करने के बाद कल्पना ने कलकत्ता विश्वविद्यालय में दाखिला ले लिया, जहां उन्होंने लाठी और तलवार चलाना भी सीखा। 

कल्पना दत्त 1929 में क्रांतिकारियों के संपर्क में आर्इं, लेकिन 1932 के बाद ही उन्होंने क्रांतिकारी टीम में शामिल होने और सक्रिय रूप से आजादी के लिए लड़ने का निश्चय किया। उन्होंने पुरुषों के कपड़े पहन कर अपनी पहचान बदली और  सरकारी इमारतों पर छापे मारे। पुलिस को शक हो गया कि वे  क्रांतिकारी दल की सदस्य हैं।




पुलिस उन पर नजर तो रखती थी, पर उनके खिलाफ कोई सबूत जुटाने में विफल रहती। जब पहाड़तली क्लब पर छापा मारा गया, तब पुलिस को यकीन हो गया कि वे क्रांतिकारी समूह की ही हिस्सा हैं। मौका मिलते ही धारा 109 के तहत मामला दर्ज कर कल्पना दत्त को जेल भेज दिया गया, पर सबूतों के अभाव में उन्हें जमानत मिल गई। इसके बाद वह फरार रहीं। हालांकि तीन महीने बाद ही उन्हें पकड़ लिया गया और चटगांव शस्त्रागार पर छापे मामले में मामला दर्ज कर उन्हें आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई। 1942 में वह जेल से रिहा हुर्इं, तो वे कम्युनिस्ट पार्टी में शामिल हो गई और 1943 में कम्युनिस्ट नेता पीसी जोशी से शादी कर ली। 

 नागालैंड की थी वो लक्ष्मी बाई : रानी गाइंडिनेल्यू



रानी गाइंडिनेल्यू को नागालैंड की ‘लक्ष्मी बाई’ के रूप में जाना जाता है। महज 13 साल की उम्र में उन्होंने ब्रिटिश शासन के खिलाफ लड़ने का फैसला किया था। जब वह 16 साल की थीं, तब उन्होंने केवल चार सशस्त्र नगा सैनिकों के साथ मिल कर अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई लड़ी, वह छापेमार युद्ध और हथियार संचालन में निपुण थीं। देखते ही देखते रानी गाइंडिनेल्यू नेता के रूप में उभरीं। उन्हें 1932 में गिरफ्तार कर लिया गया। उन्हें आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई। भारत की आज़ादी के बाद जब वह जेल से बाहर आर्इं तब उनकी उम्र 30 वर्ष थी। उनकी बहादुरी के लिए पंडित नेहरू ने उन्हें ‘रानी’ कह कर पुकारा था। स्वतंत्रता संघर्ष में उनकी भूमिका के लिए उन्हें पद्मभूषण से सम्मानित किया गया।


देश की पहली महिला शिक्षिका : सावित्रीबाई फुले


तीन जनवरी, 1831 में दलित परिवार में जन्मीं सावित्रीबाई ने कभी भी इन बाधाओं के आगे घुटने नहीं टेके। जब वह सिर्फ नौ साल की थीं, तो उनका विवाह ज्योतिबाराव फुले के साथ कर दिया गया। सावित्रीबाई ने अपने जीवन को एक मिशन की तरह जिया। जिसका एक ही उद्देश्य था - समाज में शिक्षा का प्रसार करते हुए, समानता के आधार पर लोगों को विकास की दिशा में आगे बढ़ाना। उस दौर में यह बहुत जोखिम भरा काम था। क्योंकि उस समय का हमारा समाज इस बात की इजाजत नहीं देता था कि दलित-आदिवासी और स्त्री समाज शिक्षित हो, पर सावित्रीबाई ने हार न मानते हुए अपना संघर्ष जारी रखा।



एक जनवरी 1848 से लेकर 15 मार्च 1852 के दौरान उन्होंने अपने पति के साथ मिल कर बिना किसी आर्थिक मदद के लड़कियों के लिए 18 स्कूल खोले। इससे पहले समाज में और शिक्षा के क्षेत्र में ऐसे क्रांतिकारी काम किसी और ने नहीं किए थे। सावित्रीबाई न केवल देश की पहली शिक्षिका और प्रधानाचार्य बनीं, बल्कि उन्होंने भारतीय समाज में स्त्रियों की दशा सुधारने की दिशा में भी कई परिवर्तनकारी काम किए। उन्होंने 1852 में ‘महिला मंडल’ का गठन किया। इस मंडल ने बाल विवाह, विधवा होने के कारण स्त्रियों पर किए जा रहे जुल्मों के खिलाफ सामाजिक बदलाव के लिए संघर्ष किया। इसके साथ ही, भारत का पहला ‘बाल हत्या प्रतिबंधक गृह’ भी खोला। सावित्रीबाई ने एक विधवा काशीबाई को आत्महत्या करने से रोक कर उसके बच्चे यशवंत को दत्तक पुत्र के रूप में अपनाया। उसे पढ़ा-लिखा कर डाक्टर बनाया। इतना ही नहीं बड़ा होने पर उसका अंतरजातीय विवाह किया। यह महाराष्ट्र का पहला अंतरजातीय विवाह था। 10 मार्च 1897 को प्लेग की वजह से सावित्रीबाई का निधन हो गया।


गोली से मौत नहीं, कुर्बानी को दी मंजूरी : प्रीतिलता वाडेकर


प्रीतिलता वाडेकर का जन्म मई 1911 में चटगांव में हुआ। वह एक होनहार छात्रा थीं और अपनी स्कूली शिक्षा पूरी करने के बाद उन्होंने कलकत्ता विश्वविद्यालय से बीए पास किया। उसके बाद उनका प्रशिक्षण लीला नाग के दीपाली संघ और कल्याण दास के छात्र संघ में हुआ, जिसके बाद वह नेता सूर्यसेन की क्रांतिकारी दल का हिस्सा हन गईं। पुलिस से सामना होने पर अपने साथियों की हत्या का बदला लेने के लिए उन्होंने अपने नेता सूर्यसेन के साथ मिल कर अंग्रेज और यूरोपीय लोगों से भरे रहने वाले एक नाइट क्लब पर हमला करने की साज़िश रची। 



प्रीतिलता ने 24 सितंबर, 1932 में अन्य सदस्यों के साथ मिल कर क्लब पर हमला किया। अंग्रेजों की जवाबी कार्रवाई में बंदूक की एक गोली उन्हें लग गई। उन्हें लगा कि अब उनका बचना नामुमकिन है, तो उन्होंने अपनी योजना के मुताबिक पुलिस की गोली से मरने के बजाए अपनी जेब से पोटेशियम सायनाइट का एक पैकेट खाकर अपनी कुर्बानी देना बेहतर समझा। मगर इतनी कम उम्र में देश के लिए कुर्बानी देने वालीं प्रीतिलता को आज कौन याद करता है?


भारतीयता की एक महान पुजारिन : भीकाजी कामा


भीकाजी न तो कोई क्रांतिकारी परिवार से थीं और न ही किन्हीं हालातों से मजबूर होकर वे क्रांतिकारी बनीं। चौबीस सितंबर, 1861 में बंबई के एक धनी पारसी परिवार में जन्मीं भारतीय मूल की फ्रांसीसी नागरिक भीकाजी स्वभाव से समाजसेवी थीं। भीकाजी को यूं तो कभी भी जीवन-संघर्ष का सामना नहीं करना पड़ा, लेकिन वे ब्रिटिश साम्राज्य से देश को आजाद करवाने की लड़ाई में आजीवन शामिल रहीं।



इंग्लैंड में वह 'भारतीय होमरूल समिति' की सदस्य बनीं। मैडम कामा ने लंदन में पुस्तक प्रकाशन का काम भी शुरू किया। वीर सावरकर की पुस्तक ‘1857 चा स्वातंर्त्र्य लढा’ (1857 का स्वतंत्रता संग्राम) प्रकाशित करने में उन्होंने सहायता की। मैडम कामा ने 1905 में अपने सहयोगी विनायक दामोदर सावरकर और श्यामजी कृष्ण वर्मा की मदद से भारत के ध्वज का पहला डिजाइन तैयार किया। 

जर्मनी के स्ट्रटगार्ड में 1907 में ‘अंतरराष्ट्रीय साम्यवादी परिषद’ की बैठक बुलाई गई। इसमें कई देशों के प्रतिनिधि आए थे। उस परिषद में मैडम भीकाजी कामा ने साड़ी पहन कर और भारतीय झंडा हाथ में लेकर लोगों को भारत के बारे में जानकारी दी। इसके बाद उन्हें ‘क्रांति-प्रसूता’ कहा जाने लगा। 

भीकाजी कामा अपने क्रांतिकारी विचार अपने समाचारपत्र ‘वंदे मातरम’ और ‘तलवार’ के माध्यम से लोगों तक पहुंचाती थीं। यूरोपीय पत्रकार उन्हें भारतीय राष्ट्रीयता की महान पुजारिन कह कर बुलाते थे। वृद्धावस्था में भीकाजी कामा भारत लौटीं और 13 अगस्त, 1936 को बंबई में गुमनामी की हालत में उनका देहांत हो गया। 


स्वाती सिंह 

गुरुवार, 6 अक्टूबर 2016

उफ्फ! क्या है ये ‘नारीवादी सिद्धांत?’ आओ जाने!

नारीवाद के बारे में सभी ने सुना होगा। मगर यह है क्या? इसके दर्शन और सिद्धांत के बारे में ज्यादातर लोगों को नहीं मालूम। इसे पूरी तरह जाने और समझे बिना नारीवाद पर कोई भी बहस या विमर्श बेमानी है। नव उदारवाद के बाद भारतीय समाज में महिलाओं के प्रति आए बदलाव के बाद इन सिद्धांतों को जानना अब और भी जरूरी हो गया है।  


दरअसल, नारीवाद एक ऐसा दर्शन है, जिसका उद्देश्य है- समाज में महिलाओं की विशेष स्थिति के कारणों का पता लगाना और उनकी बेहतरी के लिए वैकल्पिक समाधान प्रस्तुत करना। नारीवाद ही बता सकता है कि किस समाज में नारी-सशक्तीकरण के लिए कौन-कौन सी रणनीति अपनाई जानी चाहिए। महिलाएं किसी भी मामले में पुरुषों से कम नहीं हैं, इसके बावजूद उन्हें अवसरों से वंचित कर दिया जाता है। नारीवाद ऐसी तमाम परिस्थितियों के विषय में बताता है।  

किसी भी विचारधारा के अपने कुछ सिद्धांत होते हैं, जिनकी मदद से हम उस विचारधारा को अच्छी तरह समझ सकते हैं। अब हम जिक्र करेंगे नारीवाद से जुड़े कुछ प्रचलित सिद्धांतों का, जिन्हें कई बार नारीवाद का प्रकार भी माना जाता है।


 उदारवादी नारीवाद - 


  पितृसत्ता के अन्य सिद्धांतों के इतिहास में उदारवादी नारीवाद का इतिहास बेहद पुराना है। यह स्त्री-पुरुष की समानता के सिद्धांत पर आधारित है। अठारहवीं सदी की शुरुआत में उदारवादी नारीवादियों ने आजादी व समानता के जनतांत्रिक मूल्यों और औरतों की अधीनता के बीच के अंतरविरोध को रेखांकित किया। उदारवाद की बुनियाद बने आजादी, समानता और न्याय के विचार सत्ताहीन और चहारदिवारी में बंद महिलाओं की जिंदगी के अनुभवों से बिल्कुल विपरीत थे। महिलाओं के बारे व्याप्त ऐसी गलत धारणाओं को ठीक करने में शुरुआती उदारवादी नारीवादियों, विशेषकर मेरी वोल्स्टोन क्राफ्ट ने जोरदार ढंग से हस्तक्षेप किया। साल 1792 में लंदन से पहली बार प्रकाशित अपने आलेख ‘महिलाओं के अधिकारों का समर्थन’ में उन्होंने महिला-अधिकारों की पुरजोर हिमायत की। 

इसके बाद, इटली की क्रिस्­टीन डी पिजान ने पहली बार लिंगों के आपसी संबंधों के बारे में लिखा और जेरेमी बैंथम ने अपनी किताब ‘Introduction to the Principles of Morals and Legislation’ में स्त्रियों को उनकी कमजोर बुद्धि का बहाना बना कर अधिकारों से वंचित करने की कई राष्­ट्रों की मंशा की आलोचना की। इस धारा में मेरी वोलस्­टोनक्राफ्ट, हैरियट टेलर, जान स्­टुवर्ट मिल, बैट्टी फ्राइडन ग्­लोरिया स्­टेनम व रेबिका वाकर जैसे नाम शामिल हैं।


समाजवादी/मार्क्सवादी नारीवाद


समाजवादी नारीवादियों ने न केवल महिलाओं की गुलामी के उदय के - एंगेल्स के विश्लेषण को अपनाया, बल्कि मार्क्सवादी धारणाओं को लागू कर महिलाओं के शोषण चक्र को भी समझने का प्रयास किया। ये नारीवादी, महिलाओं के उन मौजूदा विश्वासों और प्रवृत्तियों का महिमंडन नहीं करते, जिन पर पितृसत्ता विचारधारा का वर्चस्व होता है और जो महत्त्वपूर्ण तरीके से रोजमर्रा के जीवन के पितृसत्तात्मक ढांचे से प्रभावित होते हैं। 

भारत में समाजवादी नारीवादियों ने घरों से काम करने वाली महिलाओं को एकजुट करने के प्रयास किए हैं। महिला खेतिहर मजदूरों के लिए खासतौर से जमीन के स्वामित्व की मांगें उठाई हैं। बारबरा इह्रेंरिच ने अपने लेख ‘समाजवाद क्­या है?’ में इस बात का जिक्र किया है कि मार्क्सवाद और नारीवाद को मिला कर ही समाजवादी नारीवाद की विचारधारा विकसित हुई है।

समाजवादी नारीवादियों की समाज के बारे में सोच केवल अर्थव्यवस्था तक सीमित नहीं है। इनका मानना है कि उत्पादन-प्रक्रिया में प्रजनन-कर्म (जो घर में नारी द्वारा किया जाता है) आता है। लिंग के आधार पर विभाजित श्रम एक तरह से नारी पर थोपा जाता है। इसी प्रकार पितृसत्तात्­मक समाज में नारी के यौन संबंधी कार्य भी पुरुषों की मर्जी के अनुसार निर्धारित होते रहे हैं। ये मानते हैं कि स्­वतंत्र प्रजनन व यौन कर्म के लिए शोषण को खत्म करना जरूरी है, यह तभी हो सकता है जब पूंजीवादी व्­यवस्­था व पितृसत्ता का अंत हो।

समाजवादी नारीवाद की रणनीति की व्याख्या ‘शिकागो वीमेंस लिबरेशन यूनियन’ के चैप्टर (1972) में की गई। इसके अनुसार समाजवादी नारीवादी मानते हैं कि पूंजीवादी व्­यवस्­था में पूंजीवादी वर्ग का वर्चस्व व दमन संस्थाओं के माध्यम से व्यवस्थित तरीके से सुनिश्चित किया जाता है। 


 रेडिकल नारीवाद


'रेडिकल नारीवाद' में निहित ‘रेडिकल’ शब्द का अर्थ अतिवादी या हठधर्मी के विपरीत ‘संपूर्ण ज्ञान’ यानी ‘जड़ तक जाने से’ है। यह इस बात को दिखाता है कि समकालीन समाज में जेंडर पर आधारित विभेद किस तरह पूरे जीवन की संरचना करते हैं। यह पितृसत्ता द्वारा स्त्रियों के ऊपर प्रभुत्व की प्रणाली के प्रति अपने विरोध के मसले पर एकजुट हैं। रेडिकल नारीवादियों का कहना है कि पितृसत्ता के कारण महिलाओं ने भी ‘नारी गुणों’ की हकीकत को स्वीकार किया। यह पुरुष संस्कृति के मूल्यों को चुनौती देता है और यह इस बात का हिमायती नहीं है कि महिलाएं पुरुषों का अनुसरण करें। इसके विपरीत यह महिलाओं की पारंपरिक-संस्कृति पर आधारित नए मूल्यों का सृजन चाहता है।

यह वर्तमान सामाजिक-प्रणाली के समूची उत्पीड़न को रेखांकित करता है, जिसमें किसी औरत के मूल्यांकन का तरीका उसकी उर्वरता के अलावा पुरुषों के लिए उसका यौन आकर्षण ही होती है। आधुनिक रेडिकल नारीवादी सिद्धां­त के उदय में कुछ पुस्­तकों ने अहम भूमिका अदा की, जिनमें पहली किताब सिमोन द बोऊवार की  ‘द सेकेंड सेक्स’ थी। इसके साथ ही, शूलामिथ फायरस्­टोन की किताब द डायलेटिक्­स ऑफ़ सेक्स में भी रेडिकल नारीवाद की अवधारणा का विवरण दिया गया है। 


पर्यावरणीय नारीवाद 



पर्यावरणीय नारीवाद रेडिकल नारीवाद का विस्तृत स्वरूप है। इनके अनुसार स्­त्री की अधीनता, पितृसत्ता के जरिए लैंगिक शोषण है और इसी प्रवृत्ति ने पुरुष और स्­त्री के बीच स्­वाभाविक जैविक भिन्­नताओं पर जोर दिया है। यह धारा जोर देती है कि स्त्रियों में कुछ गुण निहित हैं, जैसे- प्रकृति से निकटता, पालन-पोषण करने के गुण, जनवादी और इकठ्ठे रहने की भावना व शांति बनाए रखना। इस प्रकृति के अनुसार हिंसा और दूसरों पर हावी होना पुरुषों में निहित गुण हैं। नारीवाद ने पृथ्वी  पर पितृसत्तात्मक प्रक्रिया के वर्णन द्वारा पर्यावरण के बारे में एक राजनीतिक समझ पैदा की है। 


 अश्वेत नारीवाद 


अश्वेत नारीवाद का केंद्रीय तर्क है कि वर्गीय, नस्लीय और लैंगिक शोषण एक-दूसरे से संबंधित है। सालों से नारीवाद की प्रचलित धाराओं ने लैंगिक-शोषण पर बात करते हुए नस्लीय वर्गीय-शोषण को लगातार नजरअंदाज किया हैं। इसके बाद, साल 1974 में कॉमबाही रिवर कलेक्टिव ने यह तर्क प्रस्तुत किया कि अश्वेत स्त्री की मुक्ति के बाद ही पूरे मानव-समाज की मुक्ति संभव है। अश्वेत आंदोलन की आधारभूमि को तैयार करने में एलिस वॉकर केवुमेनिस्म के सिद्धांत का महत्त्वपूर्ण योगदान रहा है।

एलिस वाकर और अन्य नारीवादियों ने यह जाहिर किया कि अश्वेत स्त्री के जीवन अनुभव श्वेत और मध्यवर्गीय स्त्रियों की अपेक्षा न सिर्फ अलग हैं बल्कि उसके शोषण की परिस्थितियां भी अधिक जटिल हैं। अश्वेत स्त्री आंदोलन के उदय का कारण भी इसी तर्क पर आधारित है कि श्वेत मध्यमवर्गीय और पढ़ी-लिखी स्त्रियों ने नारीवाद की जिस धारा का नेतृत्व किया, उसमें वर्ग व नस्ल पर आधारित शोषण को तवज्जो नहीं दिया गया।

पेट्रिशिय हिल कॉलिन्सने ने अपनी महत्त्वपूर्ण कृति ‘फेमिनिस्ट थॉट’ में अश्वेत नारीवाद को परिभाषित करते हुए कहा कि ‘इस नारीवाद को सैद्धांतिकी देती हुई विदुषियों ने साधारण अश्वेत स्त्री के अनुभवों और उसके विचारों को शामिल करते हुए एक अलग किस्म को दृष्टि अपने समुदाय और समाज के प्रति प्रदान की।’



स्वाती सिंह