सोमवार, 2 फ़रवरी 2015

भारत-पाक समस्या: उपजी? या उपजाई.?

राजमोहन गाँधी( प्रसिद्ध इतिहासकार,दार्शनिक और पत्रकार) ने  भारत के सन्दर्भ में कहा था कि, "भारतीय इतिहास की कई घटनाएं इस बात की गवाह हैं कि दुश्मन का मुकाबला करने के लिए तो हमारी एकता कई बार बनी लेकिन दुश्मन पर विजय पाने के बाद हम क्या करेंगे,भावी मुकम्मिल योजना क्या होगी,यह विचार देश में मुकम्मिल ढंग से आगे नहीं बढ़ पाया। आज़ादी तो मिल गयी लेकिन आज़ादी के बाद की दुनिया हम कैसे बनाएँगे उसके बारे में बहुत स्पष्टता नहीं थी"।भारत-पाकिस्तान सीमा पर लगातार बढ़ते तनाव की घटनाओं को देख कर राजमोहन की ये बातें सच लगने लगती है।अंग्रेजी हुकूमत से यूँ तो हमारा देश 1947 में आज़ाद हुआ लेकिन क्या ये एक वास्तविक आज़ादी थी? ये कह पाना मुश्किल था, क्योंकि उन्होंने भारत की अखण्डता और एकता में 'फूट डालों,राज करो' नीति के तहत एक ऐसा विष घोला कि भारत में लोकतन्त्र की स्थापना के साथ पाकिस्तान का एक अलग राष्ट्र के रूप में उदय हुआ। भारत से पाकिस्तान का अलगाव खून-खराबें के साथ हुआ,जिसके फलस्वरूप नव-निर्मित दोनों राष्ट्रों के नागरिकों के बीच विद्वेष का स्थायी भाव उपजा जो निरंतर कम-ज़्यादा होते हुए आज भी कमोबेश उसी रूप में परिलक्षित होता है। रहीमदास जी का एक दोहा है-
             ' रहिमन धागा प्रेम का,मत तोरेहु चटकाय।
                टूटे से फिरि ना जुरै, जुरै गांठ परि जाय।।'
जो भारत और पकिस्तान के रिश्तों के लिए एकदम सटीक मालूम होता है। तत्कालीन नेताओं की सत्ता को लेकर लोलुप्ता इस विभाजन का मूल कारण बनी। जिसका भुगतान तब से लेकर आज तक दोनों देशों के नागरिक कर रहे है। कभी सीमा पर अपने-अपने देशों के सिपाही बन शहीद होकर, तो कभी सुरक्षा के नाम पर अपने घरों को छोड़ कर पलायन करने में। मानव-निर्मित इन तमाम परिस्थितियों ने भले ही इन दो देशों के दिलों को जुदा कर दिया हो,लेकिन कुदरत आज भी इन्हें एक मानती है। हिमालय पर्वत इन तमाम विद्वेष को नज़रअंदाज कर आज भी इन दोनों राष्ट्रों का शिरमौर्य है। हिमालय की तलहटी से निकलने वाली नदियां बिना किसी भेदभाव के दोनों राष्ट्रों की प्यास बुझाती है। भाषा हो या लोगों की रूप रेखा दोनों राष्ट्रों में ज़्यादा फ़र्क नहीं दिखाई पड़ता, यदि देखने वाले की नज़र का नजरिया एकता हो।
भारत पकिस्तान के बीच सम्बन्ध दिन-प्रतिदिन बिगड़ते जा रहे है, जिनका समाधान करना दोनों राष्ट्रों के विकास और सुरक्षा के लिए एक अनिवार्य पहलू है। लेकिन अब प्रश्न आता है कि आखिर इनके सम्बन्ध कैसे सुधारे जा सकते है? ऐसा नहीं कि पाकिस्तान से सम्बन्ध सुधारने की कोशिश नहीं की गई, लेकिन अगर कोशिश की गई तो आखिर कमी कहाँ रह गई? इस बात पर गौर करने के बाद ही कोई योजना बनाई जा सकती है।
            सिक्के के दो पहलुओं को तरह भारत और पाकिस्तान के बीच जितनी समानताएं है उतनी ही विषमताएं भी विद्यमान है। भारत में जहां सरकार लोगों के द्वारा चुनी जाती है तो वहीं पकिस्तान की निर्धारित राजनीति-प्रणाली के विरुद्ध सैन्य शक्ति के आधार पर सरकार चुनी जाती है,जिनका मूलाधार होता है 'आतंक'( जैसे -परवेज मुशर्रफ द्वारा आतंक के बल पर सत्ता में आना )। अब बात की जाय लोकतन्त्र के चौथे स्तंभ यानी मीडिया की तो जहां भारत में मीडिया को एक अच्छे लोकतन्त्र की विशेषता के अभिव्यक्ति की स्व्तंत्रता के तहत पूर्ण-स्व्तंत्रता प्राप्त है। वहीं पाकिस्तान में मीडिया का नाम तो है लेकिन उनकी स्वतन्त्रता की वैद्यता सत्ताधारी के फ़ायदे पर शुरू होती है और वहीं पर खत्म। भारत और पाकिस्तान के बीच की ये दो विषमताएं मूलतः दोनों राष्ट्रों के बीच दूरियों का कारण है।
जैसा की हम सभी जानते है किसी भी राष्ट्र की राजनीतिक-प्रणाली उस देश की स्तिथि के लिए जिम्मेदार होती है। यदि सत्ता की नींव आतंक पर रखी गई है तो हमेशा आतंक को बढ़ावा देगी, फिर क्या मुम्बई की 26/11 की घटना और क्या पेशावर के सैनिक स्कूल में बच्चों  को मौत के घाट उतारना। पाकिस्तान में चुनाव के वक़्त कश्मीर के मुद्दे का इस्तेमाल एक गड़े हुए मुर्दे की तरह सालों से चला आ रहा है,जिनके दम पर वहां अपनी सत्ता लायी जा सके। नतीज़न भारत में मीडिया जहां आँख बन्द करके आतंकवाद के मसले पर पाकिस्तान का प्रदर्शन इस तरह करता है कि मानों हर पाकिस्तानी आतंकवादी है, तो वहीं दूसरी तरफ पाकिस्तानी मीडिया आतंकवाद की भेंट चढ़े अपने बच्चों की मौत पर सब जानते हुए भी चुप्पी साधने को मजबूर कर दिया जाता है।
पाकिस्तान की बुनियाद, मजहबी घृणा को बढ़ावा देकर,निजी महत्वक्षाओं की पूर्ति का सेतु बनाकर और विनाशक एवं विभाजनकारी प्रवित्तियों को जन्म देते हुए रखी गई थी। नतीज़न 63 वर्षों में एक अलग देश के रूप में स्थान पाने के अलावा यदि कुछ पाया है तो वो है देश की राजनीतिक अस्थिरता के सायों में बनती बिगड़ती ऐसी सरकारें जो सीमाओं के अंदर सम्पन्नता के मजबूत आधारों को सुनिश्चित करने में असफल रहीं। और अपनी इस विफलता पर बखूबी पर्दा डालते हुए हर बार कश्मीर के मुद्दे को जीवित रख कर असंख्य लोगों की मजहबी भावनाओं को बार-बार उभरता आया है।
         भारत-पाकिस्तान की स्तिथि के विवरण के उपरांत, अब सवाल उठता है कि आखिर कैसे इन दो देशों के बीच घुली इस कड़वाहट को कम किया है? महात्मा बुद्ध ने अपने बताए हुए चार आर्य सत्यों में बताया था कि यदि दुनिया में दुःख है तो दुःख का कारण भी है और यदि कारण है तो निवारण भी है। इसी तर्ज़ पर भारत-पाकिस्तान के रिश्ते बिगड़ने के तमाम कारण रहें हो,लेकिन उन्हें सुधारने के भी कई उपाय है। बस इंतज़ार है तो इन उपायों को खोज कर इनपर काम करने का।

स्वाती सिंह

असली भारत में संघर्षपूर्ण युवा-स्थिति   

युवा किसी भी देश की नींव होते है,जिनपर देश के विकास का भविष्य टिका होता है। और जब बात हो भारत की तो कहते है कि असली भारत यहां के गावँ में बसता है। आज इसी असली भारत के युवा तेज़ी से विकास मार्ग की ओर अग्रसरित हो रहे है,जिसका सूचक है गांवों से शहरों की तरफ रोजगार व शिक्षा के लिए ग्रामीण-युवाओं का बढ़ता पलायन ग्राफ़।        

        

            भारत में लगातार शिक्षा स्तर में वृद्धि हो रही है। क्या गांव और क्या शहर सभी शिक्षा क्षेत्र में कदम-से-कदम मिला कर चलने की होड़ में शामिल है। लेकिन इस होड़ में शामिल होना जितना आसान है उतना ही कठिन है इस होड़ में बने रहना।हम बात कर रहें है उन युवाओं की जो ग्रामीण परिवेश से शहरी दुनिया में अच्छी शिक्षा पाने आते है। जिससे उन्हें अच्छा रोज़गार मिल सके और वे अपने परिवार के साथ-साथ समाज और देश के विकास में भी अपना योगदान दे सकें।                 

लेकिन क्या वास्तव में, गांव से शहरों की तरफ जाना देश के युवाओं के लिए लाभकारी है? कह पाना मुश्किल है।गांव से शहर के ओर जब ये युवा अच्छी शिक्षा और रोज़गार का सपना लिए जब अपने घर से निकलते है तो इनपर इनके परिवार की उम्मीदें और समाज की नज़र टिकी होती है। कभी गावँ में अपने खेत बेच कर तो कभी बैंक में सालों से जमा की हुई पूंजी लगा कर एक ग्रामीण परिवार बड़ी उम्मीदों के साथ अपने बच्चे को शहर के बड़े कॉलेज में दाखिला दिलाता है। जो उनके बच्चे को उस होड़ में तो शामिल करवा देता है,लेकिन होड़ में बने रहना युवा के सामने सबसे बड़ी चुनौती होती है।                    

शहरी वातावरण के अनुरूप ढलना युवा के लिए एक बड़ी चुनौती होती है, जहां उसे शिक्षा के साथ-साथ अपनी दैनिक दिनचर्या के खर्चों के लिए आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनना ज़रूरी हो जाता है। जिसमें वर्तमान समय में युवा सबसे ज़्यादा  गुमराह किये जा रहे है। महानगरों में तमाम ऐसे रैकेट इन युवाओं की तलाश में रहते है जिन्हें पढ़ाई के साथ-साथ आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनने की आवश्यकता होती है। ये रैकेट इन युवाओं को अपने जाल में फांस कर इनका शारीरिक व मानसिक शोषण तो करते ही है, इसके साथ ही इन्हें पैसों के ढ़ेर और महानगरों की चकाचौंध दिखा कर दिशा-भ्रमित भी करते है। जिनकी पहचान कर बच निकलना युवा के लिए एक बड़ी चुनौती होती है।          
         
आर्थिक जीवन के बाद अब बारी आती है,सामाजिक जीवन की। जो युवा के व्यवहार,मूल्य और लक्ष्य को एक सही आकार प्रदान करता है। वे युवा जो अपने गावं-घर से दूर शिक्षा पाने जाते है और सालों अपनों से दूर रह कर जीवन में एक मुकाम पाने की जदोजहद से जूझते है,उनके परिवार की उम्मीदें जहां एक ओर अपने मार्ग पर आगे बढ़ने की प्रेणना देती है जो वहीं समाज की नज़रें उन्हें हर पल एक 'डर का एहसास कराती है। हरपल समाज को लेकर युवा-मन में डर से बस एक बात चलती है कि,' लोग क्या कहेंगे? अगर मुझे अच्छी पढ़ाई करने के बाद एक अच्छी नौकरी नहीं मिली? अच्छा रोजगार पाने में अगर असफ़ल हुए तो समाज को क्या चेहरा दिखाएंगे? ' जैसे तमाम अन्य सवाल। समाज के इन सवालों के दबाव का असर कभी-कभी  युवा मन में इस कदर घर कर जाता है, वे अपने जीवन को खत्म करने तक की गलती कर बैठते है। जो हमारे समाज को शर्मसार करने वाला एक कड़वा सच है।              
          
  समाज के कुछ निर्धारित मानकों में जहां एक ओर लड़कों के सन्दर्भ में आर्थिक रूप से सशक्त होने को सफलता मानते है तो वहीं लड़कियों के सन्दर्भ में समाज की बनाई हुई स्त्री ( इज़्ज़त के नाम पर खुद को घर की दहलीज़ में कैद करना और पढ़े-लिखे होने के बावज़ूद अपनी जिंदगी के फ़ैसले के लिए दूसरों पर आश्रित रहना) या यूँ कहें समाज की संस्कारी बहु, बेटी और लड़की के मानक पर खुद को प्रमाणित करना आवश्यक होता है,जिसके दबाव में अधिकांश युवा अपना जीवन व्यतीत कर रहे है।ये दबाव धीरे-धीरे युवा के मानसिक-संघर्ष को बढ़ावा तो देती ही है,इसके साथ-साथ उन्हें अपने परिवार और सामाजिक-समूहों से दूर करने लगती है। जिस कारण आज युवाओं में अकेलेपन और अवसाद की समस्या दिन-प्रतिदिन बढ़ती जा रही है।            
              
 युवा आज के समय में, इन तमाम प्रतिकूल परिस्तिथियों को पार करते हुए सफल मुकाम तक पहुँच रहे है। लेकिन इन सफल युवाओं के प्रतिशत का दायरा दिन-प्रतिदिन सिमटता जा रहा है। जो हमारे समाज के साथ-साथ देश के विकास के लिए भी ख़तरे की घण्टी है।     
             
आज भारत में नई सरकार के साथ-साथ, देश के विकास पर बातचीत तेज़ हो गई। जिसमे युवा-विकास पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है जिससे युवा-शक्ति की पूरी ऊर्जा देश के विकास में सही दिशा में लग सके। लेकिन क्या विकास-मॉडल की अवधारणा और इसकी नीति हमारे समाज में युवा-स्तिथि का विकास कर पाएंगी?  क्या नयी सरकार के युवा-विकास के लिए किये जाने वाले प्रयास उनकी स्तिथि और समाज के उनके प्रति-दृष्टिकोण में एक सकारात्मक परिवर्तन कर पायेगी? क्या ग्रामीण क्षेत्र में रहने वाले युवाओं का विकास के लिए शहरों की तरफ पलायन करना आवश्यक होगा? इन जैसे तमाम सवालों पर आज देश के हर युवा की नज़र टिकी हुई है। 
             अब देखना है कि अच्छे-दिन लाने के वादे पर बनी सरकार युवाओं की उम्मीदों पर कितनी खरी उतरती है।

स्वाती सिंह

शनिवार, 17 जनवरी 2015

 'दुर्गा भाभी' : सुनहरे इतिहास के पन्नों में गुम, एक सुनहरा व्यक्तित्व

        
           भारतीय इतिहास में सन् 1857 से लेकर 1947 तक के कुल नब्बे वर्ष दर्ज़ है, -"एक संघर्ष की लड़ाई "के नाम। ये "संघर्ष की लड़ाई" थी-'भारत को ब्रिटिश शासन से आज़ाद करके, लोकतन्त्र की स्थापना करने के लिए'। इस संघर्ष में हज़ारों-लाखों जवानों ने देश के लिए शहादत दी। जिससे उनके आने वाला भविष्य एक स्वतन्त्र देश में सांस ले सके।'                  
          यूँ तो भारतीय इतिहास के पन्नों में, आज़ादी की इस लड़ाई और इसमें सक्रियता से भाग लेने वाले तमाम आंदोलनकारियों के नाम दर्ज़ किए गए। लेकिन ऐसे बहुत से ऐसे आंदोलनकारी भी है, जिन्होंने ना केवल अपना पूरा जीवन इस संघर्ष के नाम किया, बल्कि इस संघर्ष को सफ़ल बनाने में भी अपना अदभुत योगदान दिया और इस लड़ाई की अगुआई की बजाय पर्दे के पीछे रह कर अपने अगुवाओं को आगे बढ़ने और डटे रहने का साहस प्रदान किया। लेकिन दुर्भाग्यवश! इन्हें ना तो हमारे इतिहास के पन्नों पर जगह दी गई और ना ही इनकी शहादत को वो सम्मान मिल सका, जिनके ये हक़दार थे और वे महत्वपूर्ण शख्स धीरे-धीरे हमारे सुनहरे इतिहास की चमक से पीछे अँधेरे में गुम होते जा रहे है। ऐसी ही शख्सियतों में से एक हैं-'दुर्गा भाभी'।                      
      'दुर्गा भाभी' का वास्तविक नाम था-दुर्गावती देवी। इनका जन्म 7 अक्टूबर 1907 में शहजादपुर ग्राम में पण्डित बांके बिहारी के यहां हुआ। दुर्गावती का विवाह 11 वर्ष की अल्पायु में प्रो.भगवती चन्द्र वोहरा के साथ हुआ। दुर्गावती के पिता जहां इलाहाबाद कलेक्ट्रेट में नाज़िर थे और उनके ससुर शिवचरण जी रेलवे में ऊँचे पद पर तैनात थे।                  
         वोहरा क्रन्तिकारी संगठन(HSRA-Hindustan Republican Association)के प्रचार सचिव थे। दिल्ली के क़ुतुब रोड में स्तिथ घर में,वोहरा विमल प्रसाद जैन के साथ बम बनाने का काम करते थे,जिसमें दुर्गा भी उनलोगों की मदद करती। शुरूआती दिनों में,दुर्गा सूचना एक स्थान से दूसरे स्थान ले जाने और बम के सामान को लाने पहुँचाने का भी काम करती थी। 16 नवम्बर,1926 में लाहौर में,नौजवान भारत सभा द्वारा भाषण का आयोजन किया गया,जहां दुर्गावती नौजवान भारत सभा की सक्रिय सदस्य के तौर पर सामने आयी। दुर्गावती एक चिद्रनवेशि योजना-निर्मातक थी,जिनकी योजना कभी-भी विफ़ल नहीं होती थी।                    
          17 दिसंबर,1928 में,भगत सिंह और सुखदेव ने साथ मिलकर सौंडर्स की हत्या की। हत्या के बाद,ब्रिटिश पुलिस इनकी ख़ोज में जुट गई। जिसके बाद ये दोनों दुर्गावती के पास पहुँचे और दुर्गावती ने बड़ी ही सतर्कता के साथ भगत और सुखदेव को सुरक्षित कलकत्ता पहुंचाने की योजना बनाई।             
               18 दिसंबर,1928 भारतीय इतिहास में दर्ज़ एक ऐसी तारीख है, जिसे भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में 'रेड-लेटर डे' माना जाता है, क्योंकि इसी दिन भारत में एक नयी उम्मीद की पटरी पर दौड़ी,यानी भारत की पहली ट्रेन-'कलकत्ता मेल'। जो हिस्सा बनी दुर्गावती की योजना की। दुर्गावती ने भगत सिंह और सुखदेव को कलकत्ता पहुंचाने का निश्चय किया,उस समय दुर्गावती के पति प्रो.वोहरा भी कलकत्ता में थे।              
         दुर्गावती की योजना के अनुसार,भगत सिंह ने अंग्रेजों को रंग में रंगे एक भारतीय का वेश धारण किया और दुर्गा उनकी पत्नी बनी और सुखदेव ने उनके नौकर का रूप धरा। सुखदेव ने दुर्गावती और भगत सिंह के लिए कलकत्ता मेल में फर्स्ट-क्लास की दो टिकट लिया और खुद के लिए स्लीपर का टिकट लिया,  जिससे किसी को शक ना हो। ये योजना जितनी आसान नज़र आ रही थी,वास्तव में ये उतनी की जोखिम भरी थी। क्योंकि रेलवे स्टेशन पर अंग्रेजी सेना का कड़ा पहरा था और जगह-जगह भगत सिंह और सुखदेव की तलाश करने के लिए उनकी तस्वीरों के पोस्टर लगवाएं गए थे। लेकिन दुर्गावती के आत्मविश्वास और दूरदृष्टि पर सभी को भरोसा था, इन सबमें दुर्गावती का दो साल का बेटा शचीन्द्र भी उनके साथ था। अंतत:दुर्गावती की योजना सफल हुई और वे सभी सुरक्षित कलकत्ता पहुंच गए।                  
           कलकत्ता पहुंचने पर,दिल्ली केंद्र पर बम फेकनें की योजना बनी। जिसके लिए बम निरक्षण करते वक़्त प्रो.वोहरा की मौत हो गई। इसके बाद,भगत सिंह,सुखदेव और राजगुरु ने बम फ़ेकनें के बाद आत्मसमर्पण कर दिया और 8 अप्रैल,1929 को इन्हें फांसी की सज़ा सुनाई।                          

         इस सबके बाद दुर्गावती एकदम अकेली पड़ गई,लेकिन उन्होंने हिम्मत नहीं हारी और पंजाब के पूर्व राज्यपाल लार्ड हैली को मारने की साजिश रच डाली,जो क्रांतिकारियों का बड़ा दुश्मन था।
        1 अक्टूबर,1931 को बॉम्बे के लमिंगतों रोड पर दुर्गावती ने साथियों के साथ मिलकर हैली की गाड़ी को बम से उड़ा दिया, जिसके बाद पूरी ब्रिटिश पुलिस दुर्गावती की तलाश में जुट गई। लेकिन वे दुर्गावती को खोज नहीं पाए, फिर एक दिन खुद दुर्गावती ने पुलिस के सामने आत्मसमर्पण कर दिया। जिसके बाद उन्हें तीन साल की सज़ा सुनाई गई। तीन साल की सज़ा के खत्म करने के बाद दुर्गावती ने लखनऊ के पुराने किले में गरीब बच्चों को पढ़ना शुरू किया,जिसका नाम -'मोन्टेसोरी स्कूल' पड़ा। दुर्गावती ने 15 अक्टूबर,1999 में दुनिया को अलविदा कह दिया।       
         दुर्गावती की मृत्यु हुए यूँ तो कई साल बीत चुके है,लेकिन आज भी उनकी वीरता की कहानी हर हिन्दुस्तानी के ध्यान को आकृष्ट कर,उन्हें गौरववन्वित करती है। दुर्गावती मिशाल है, नारी के सशक्त रूप की और सच्चे देश भक्त की। जिनके लिए क्रांति का मतलब सिर्फ सत्ता का तख्ता पलट करना मात्र नहीं था,उनके लिए असल क्रांति का मतलब था,आज़ादी के बाद एक सशक्त देश की नींव डालना, एक शिक्षित समाज का निर्माण करना और यही वजह थी कि दुर्गावती ने शुरू से ही गरीब बच्चों को पढ़ाने का नेक काम शुरू किया,जिसे उन्होंने जीवन पर्यन्त कायम रखा। दुर्गावती की यही कार्य-प्रणाली और दूरदृष्टी उनके व्यक्तित्व को महान और अविस्मरणीय बनाती है।

स्वाती सिंह

सोमवार, 29 दिसंबर 2014

'सुशासन-दिवस' पर तकनीकी भाषण

25 दिसंबर 2014 को भारत सरकार की तरफ से 'भारतीय भारतीय सुशासन दिवस' घोषित किया गया।25 दिसंबर जन्मदिवस है-जीसस क्राइस्ट,मदन मोहन मालवीय,अटल बिहारी वाजपेयी,मोहम्मद अली जिन्ना और नवाज़ शरीफ़ का।यूँ तो भारतीय समाज के परिपेक्ष्य में सुशासन की अवधारणा जितनी नयी प्रतीत होती है,इसकी जड़े उतनी ही पुरानी और गहरी है।प्राचीन काल से ही हर शासक और हर एक बादशाह ने इसे अपनी सत्ता में लागू करना चाहा है। उन्हें सत्ता चाहे विरासत में मिली हो या फिर उन्होंने युद्ध में जीती हो लेकिन उनकी ख्वाहिश सिर्फ एक रही- सुशासन। क्योंकि ये सुशासन ही है जो किसी सत्ता की वैलिडिटी और डेवलपमेंट को वारेंटी प्रदान करता है। सुशासन की इसी महत्ता को ध्यान में रखते हुए,इस संगोष्ठी और भाषण-प्रतियोगिता का आयोजन किया गया-जिसमें सुशासन के लिए तकनीक और प्रौधिकी के उपयोग को केंद्रित किया गया है।  
 
सुशासन क्या है?
        अब सवाल है कि एक सुशासन के मानक क्या हो?जिनके आधार पर सुशासन को परिभाषित किया जाए?संयुंक्त राष्ट्र में सुशासन के कुल आठ मानक बताये है:-
1.विधि का शासन
2.समानता
3.भागीदारी
4.अनुक्रियता
5.बहुमत
6.प्रभावशाली दक्षता
7.पारदर्शिता
8.उत्तरदायित्व
      जिस शासन में,किसी व्यक्ति-विशेष का नहीं बल्कि विधि का शासन हो। जहां समानता हो अवसरों की, न्याय की और जिंदगी जीने की। जिस देश में शासन में किसी एक की नही हर जन की भागीदारी हो,अनुक्रियता हो और नागरिकों का बहुमत हो। शासन में प्रभावशाली दक्षता हो, पारदर्शिता हो, किसी विशेष समूह के समक्ष नहीं नागरिक और शासन-प्रणाली में और जहां उत्तरदायित्व एक का नहीं सबका हो, ये गुण जिस शासन में हो, उस देश का शासन 'सुशासन' कहलाता है।
         
तकनीक क्या है?
        अब बारी आती है टेक्नोलॉजी की। यदि हम तकनीक को सिर्फ रसायन,भौतिकी,और जीव विज्ञान की टर्मिनोलॉजी में परिभाषित करते है तो ये एक तकनीक को परिभाषित करने के का पारम्परिक दृष्टिकोण कहलाएगा। क्योंकि तकनीक का तातपर्य मानव-ज्ञान और उपलब्ध संसाधनो के उपयोग कर  किसी समस्या का समाधान करने और अपनी जरूरतो की पूर्ति करने या प्रयोगशाला में भौतिक चीज़ों की ख़ोज करना मात्र नहीं है। कार्य-कारण को पूर्ण तार्किकता से प्रस्तुत करना 'तकनीक' कहलाता है और इस तकनीक शब्द का प्रयोग हम उन सभी विषयों के लिए करते है जहां हम किसी भी समस्या का समाधान तार्किक सोच या तर्कों के आधार पर करते है।

Innovation क्या है?
Innovation यानी, नवाचार। जिसका शाब्दिक अर्थ है-नई खोज।
       एक नयी खोज तभी एक सफल सोच बन सकती है जब इसे हर इंसान समझ सके और इसे लागू कर सके। जिनके कुछ मूल तत्वों पर प्रकाश डालना ज़रूरी है, क्योंकि कोई भी सच या अच्छी चीज़ तभी सफल हो सकती है जब वह देशकाल और वातावरण के अनुकूल हो।
1.अडोप्टर्स की समझ
2.संचार चैनल
3.समय
4.सामाजिक व्यवस्था।
सुशासन के सन्दर्भ में,जबतक किसी नवाचार को देश के अंतिम नागरिक तक ना पहुंचे तबतक सुशासन की कल्पना भी अधूरी है। क्योंकि सुशासन अपने आप में एक नवाचार है,और जब हम इस नवाचार की बात करते है तो उतनी ही सक्रियता से इसका लागू होना भी आवश्यक है।

भारत में तकनीकी-विकास:-
* भारत आज तकनीक और विज्ञान के क्षेत्र में दुनिया में एक सशक्त देश के रूप में तो उभर रहा है।
लेकिन वहीँ दूसरी ओर, महिलाओं के लिए इसे जी-20 देशों में सबसे खतरनाक देश घोषित किया गया।

*भारत में हर साल, लाखों- करोड़ों की संख्या में देश के युवा डॉक्टर और इंजीनीयर बनते है,लेकिन इसके बावज़ूद कृषि, दवाओं तथा तकनीकी-विकास सम्बन्धी चीज़ों का निर्यात हम विदेशों से करते है।

*आरटीआई को भारत इ-गवर्नेंस का एक सशक्त हथियार माना जा रहा है, वहीं दूसरी ओर, आरटीआई एक्टिविस्टों की हत्या की घटनाएं दिन-दुगनी और रात-चौगुनी की गति से बढ़ रही है।

*सीसीटीवी कैमरे और न्यू मीडिया की तकनीकी क्रांति तो कई साल पहले भारत में आ गई,लेकिन इसके बावज़ूद, आशाराम बापू,निठारी-हत्याकांड और निर्मल बाबा जैसे तमाम लोगों के गोरख-धंधे फलते-फूलते रहे और देश को खोखला करते रहे। उससे पहले,ना कोई सीसीटीवी इनकी करतूतों की रिकॉर्डिंग कर पाया और ना न्यू-मीडिया के किसी जर्नलिस्ट की कलम इनकी तरफ घूम पायी।

*भारत में 4-जी नेट की स्पीड तो आ गई,लेकिन 2-जी घोटाले के साथ-साथ चारा-घोटाले भी आ गए।

*भारत में अगर बात हो तकनीकी-विकास और हम भारतीय युवाओं के हाथ में दिखते स्मार्टफोन और बैग में टंगे लैपटॉप की बात ना करें,तो कुछ ख़ालीपन महसूस होता है। भारत में आज हर दस युवाओं में से आठ के पास स्मार्टफोन देखने को मिल जाता है और लगभग छः के बैग में लैपटॉप,लेकिन इन युवाओं में से अधिकांश के लैपटॉप और स्मार्टफोन का ज़्यादातर इस्तेमाल नौकरी डॉट कॉम और अन्य साइट्स पर नौकरी खोजते हुए बीतता है।

ये तो चन्द उदाहरण थे,हमारी चमकती तकनीक और जमीनी हक़ीक़त की। जो इस सुनहरी चमक के पीछे का अँधेरे को दिखाती है।
25 दिसंबर को, प्रधानमन्त्री नरेंद्र मोदी ने बनारस के विकास के लिए कुल 1300 करोड़ रूपये दिए। इसके साथ ही,बिजली की खपत कम करने के लिए सोलर प्लांट,लोको शेड,आटोमेटिक स्टोर तथा अन्य उच्च तकनीकों के माध्यम से सुशासन और विकास गति को aceelerate करने के लिए नयी योजनाओं को लागू करने की बात कही।
               लेकिन अगर मैं याद दिलाऊं,हाल में हुई बनारस की एक महिला के साथ छेड़खानी की घटना जिसका विरोध करने पर उसे जला दिया गया। तो आप क्या कहेंगे? क्या यही है, हमारा तकनीकी विकास?

आज हम तकनीक में तो प्रगति कर रहे है लेकिन वहीं दूसरी ओर,व्यवहारिक परिपेक्ष्य में एक फांक देखने को मिलती है। जो किसी भी देश में सुशासन लागू होने में सबसे बड़ी रुकावट है।

स्वाती सिंह

सोमवार, 1 दिसंबर 2014

महिला सशक्तिकरण के नाम एक और बाज़ारू-चौपाल

      पिछले रविवार को वाराणसी में, एक 'महिला सशक्तिकरण केंद्र' के शुभारम्भ समारोह में जाने का मौका मिला। इस केंद्र की स्थापना वाराणसी के एक नामी एनजीओ की ओर से हुई। इस शुभारम्भ कार्यक्रम में, शहर के कई प्रतिष्ठित हस्तियों में भागीदारी ली। लगभग चार घंटे तक चलने वाले इस कार्यक्रम में, इन सभी माननीयों हस्तियों ने 'महिला-सशक्तिकरण' पर अपने-अपने विचार प्रस्तुत किये।             
        लेकिन अब प्रश्न आता है कि, आखिर ये विचार क्या थे? क्या इन विचारों का वर्तमान की ज़मीनी हक़ीक़त से दूर-दूर तक कोई भी नाता था? कहीं ये विचार किसी किताब से टीपी तो नहीं गई? ये विचार कितने तार्किक थे? इन सब प्रश्नों के जवाब मिल पाना मुश्किल है। क्योंकि हर बार की तरह ये सभी विचारक अपने-अपने पेड़ पर चढ़कर 'महिला-सशक्तिकरण' पर बाग़ देते नज़र आये।      
         दलित-महिलाओं पर लिखने वाली लेखिका ने, पीड़िताओं में दलितों का बहुमत बताया तो वहीं, जिला प्रोबेशन अधिकारी में आर्थिक-तंगी को शोषण का कारण करार दे दिया। अब इन विचारकों व कार्यक्रम के वक्ताओं पर प्रश्न उठता है कि, पीड़ित को पीड़ित के रूप में देखना ज़रूरी है या किसी वर्ग व जाति के आधार पर? और जहां तक रही बात आर्थिक-तंगी की तो क्या अगर आर्थिक रूप से सशक्त होना अगर हर समस्या का समाधान होता तो 'अरुणा राय' जैसे केस हमारे सामने नहीं होते।       
       महिला सशक्तिकरण आज एक ऐसा मुद्दा बन चुका है, जिसपर हर कोई अपना बिना कुछ जाने-समझे हर कोई अपना मत देते फिरता है। इस सबमें ये बेहद ही दुर्भाग्यपूर्ण है कि, महिला-सशक्तिकरण जैसे गम्भीर मुद्दे पर काम करने का आगाज़ तो बेहद ज्वलन्त और सकारात्मकता से शरू हुआ। लेकिन जब इसपर स्वयंसेवी संगठनों और समाज के तथाकथित बुद्धिजीवी व जागरूक वर्ग ने अपने स्वार्थ की रोटियाँ इस आग पर सेकना शुरू किया,तो वो सकारात्मकता अब दिन-प्रतिदिन ख़ाक में तब्दील होती नज़र आ रही है।   
       हमारे भारतीय समाज में, आज महिला-सशक्तिकरण के परिपेक्ष्य में एक ऐसा इंद्रधनुष देखने को मिल रहा है, जहां के उदभव की चमक सशक्त-महिला से शुरू होती दिखाई पड़ रही है लेकिन इस शुरुआत का अंत एक अन्धकार में जा कर गुम हो जाता है। जहां इसके प्रकाश की सबसे ज़्यादा जरूरत है, क्योंकि यहीं इस आधी आबादी की सर्वाधिक आबादी निवास करती है।   
         आज हमारे समाज में ऐसे केंद्रों की आवश्यकता है लेकिन इससे ज़्यादा आवश्यकता इनकी सूचना उस वर्ग तक पहुंचना आवश्यक है,जहां इसकी सबसे ज़्यादा ज़रूरत है। अगर ऐसे कार्यक्रमों में समाज के एक विशेष अभिजात वर्ग के साथ-साथ ही उस वर्ग की भी भागीदारी उसी संख्या में हो जिनके सशक्त होने की बात की जा रही है तो ये होगी इस सकारात्मक आगाज़ का पहला सशक्त बिगुल।      
       वरना 'महिला सशक्तिकरण' के नाम पर आए दिन सजने वाली इन बाज़ारू चौपालों से सिर्फ अपने स्वार्थ की रोटियाँ ही सेकी जाएंगी।   
       अब आपने कागज़ से बनी जंजीर पर महिला-सम्बन्धी समस्याओं को लिख कर तो फाड़ दिया और कहा कि, महिला आज़ाद हो गई। अगर ये सब इतना आसान होता तो शायद आज हमारे समाज में इन केंद्रों के नाम वाले किसी भी आडम्बर का पनप पाना ना मुमकिन होता।

स्वाती सिंह             

मंगलवार, 25 नवंबर 2014

दस्यु सुंदरियों की राजनीतिक चुप्पी

उत्तर-प्रदेश में चम्बल नदी के किनारे बसा 'बीहड़ का जंगल' अपने खूंखार जानवरों और खतरनाक डाकुओं के लिए जाना जाता है। सालों से चम्बल नदी के किनारे बसे बीहड़ के इस जंगल ने ना केवल खतरनाक डाकुओं के गिरोहों को पनाह दी, बल्कि इन गिरोहों की वहशी अत्याचारों से मजबूरन बनती 'दस्यु सुंदरी'  के इतिहास का साक्षी भी बना।
 

       
दस्यु सुंदरी की कहानी शुरू होती है - उत्तर प्रदेश के एक छोटे से गाँव 'गुरु के पुरवा' में रहने वाली 'फूलन देवी' के साथ। फूलन को साल 1979 में बीहड़ के कुछ  डाकुओं ने अगवा कर लिया था। यूँ तो फूलन देवी को भी एक खतरनाक डाकू के रूप में जाना जाता है, लेकिन ऐसा नहीं है कि फूलन को यह पहचान उन्हें विरासत में मिली| उनके साथ, समाज तथाकथित उच्च-वर्ग के लोगों और कई डाकुओं ने सामूहिक बलात्कार किया। इतना ही नहीं, उन्हें गाँव में सरेआम निर्वस्त्र भी किया गया। माना जाता है कि फूलन के साथ ऐसा इसलिए किया गया क्यूंकि उसका जन्म नीची-जाति में हुआ था और उसे समाज के तथाकथित ऊची जातियों का अत्याचार गवारा नहीं था, जिसके खिलाफ फूलन ने आवाज उठाई। एक नीची-जाति की औरत की यह जुर्रत उन्हें तनिक भी रास नहीं आयी और उन्होंने फूलन की अस्मिता को तार-तार कर उन्हें खत्म करने की नाकाम कोशिश की। पर दुर्भाग्यवश वे समाज की बनाई लड़की को मारने में तो सफल रहे पर नारी-शक्ति को न मार सके| आख़िरकार उन्हें एक साधारण लड़की ‘फूलन’ से बनी 'दस्यु सुंदरी' के हाथों ढेर होना पड़ा। फूलन ने इसके बाद, पुलिस के सामने आत्मसमर्पण कर दिया। सजा खत्म होने के बाद फूलन ने अपनी जैसी तमाम लड़कियों की मदद करने के लिए राजनीति में कदम रखा।

दस्यु सुंदरी बनने का सिलसिला यहीं नहीं थमा।





साल 1983 में बीहड़ के डाकुओं ने,  उत्तर प्रदेश के औराई जिले की सीमा परिहार का अपहरण किया।  सीमा परिहार पर भी डाकुओं ने अत्याचार किया। जिसके बाद, सीमा परिहार भी फूलन देवी की तरह एक खतरनाक डाकू के रूप में जानी जाने लगी। सीमा परिहार ने भी पुलिस के सामने आत्मसमर्पण किया। सीमा ने समाज-सेवा करने के लिए साल 2007 में उत्तर-प्रदेश के भदोही जिले से लोकसभा का चुनाव भी लड़ा। लेकिन सीमा को राजनीति के दावपेंच रास नहीं आए और उन्होंने राजनीति से दूरी बना ली। सीमा परिहार ने महिलाओं के ऊपर हो रहे अत्याचारों को रोकने के लिए 'ग्रीन गैंग' बनाया।



फूलन देवी और सीमा परिहार के बाद, हाल ही में रेणु यादव का नाम सामने आया है। जो बीहड़ की बनाई हुई एक और दस्यु सुंदरी है। औरैया के जमालीपुर की रेणु का अपहरण साल 2003 में बीहड़ के कुछ डाकुओं ने किया था। रेणु ने भी पुलिस के सामने आत्मसमर्पण किया। खबरें है कि रेणु जल्द ही राजनीति में कदम रखने वाली है ।                    
 

दस्यु-सुन्दरियों का एक किस्सा गौरतलब है

'दस्यु सुंदरियों' की ये कहानी हर बार यह सोचने पर मजबूर कर देती है कि जो उत्तर-प्रदेश देश का सर्वाधिक जनसंख्या वाला राज्य है और जिसे उत्तर से उत्तम प्रदेश बनाने का सपना लिए हर बार सरकार बागडोर थामती है और कई क्षेत्रों में इसे साबित भी करने की कोशिश करती है। ऐसे में, फिर राज्य में लगातार बढ़ती आतंक की ऐसी घटनाएँ जहाँ एक तरफ मानवता को शर्मसार करती है, वहीँ दूसरी तरफ, हमारे देश की राजनीति के एक ऐसे पहलु को सामने रखती है, जो अप्रत्यक्ष ढंग से वास्तविक राजनीति है। जहाँ वे इस आतंक को अपनी राजनीति के अहम मुद्दे के साथ अपना दाहिना हाथ भी बनाए रहते है। इन तीनों 'दस्यु सुंदरियों' में कई समानताएं गौरतलब है-

1-इन तीनों का ताल्लुक उत्तर प्रदेश के पिछड़े जिलों से रहा है। 

2- इन सभी के 'दस्यु सुंदरी' बनने की दास्तां का गवाह बीहड़ के जंगल साक्षी बने।

3-सभी ने पुलिस के सामने आत्मसमर्पण किया और सबसे अहम - इन तीनों दस्यु सुंदरी को समाजवादी पार्टी नें ही टिकट देकर राजनीति में उतारा।

यहां विचारणीय है कि फूलन देवी से लेकर रेणु यादव तक ने सरकार के सामने अपनी दस्यु-सुंदरी बनने की दास्तां सामने रखी। अब सवाल यह है कि इसके बावजूद,

1-      आखिर क्यों आजतक बीहड़ के खौफनाक सन्नाटे का आतंक अभी तक जीवंत है?  

2-      क्यों आजतक बीहड़ की चुप्पी पर सरकार ने अपनी चुप्पी नहीं तोड़ी?

3-      क्या कभी इन दस्यु सुन्दरियों ने उस बीहड़ में सुधार करने का नहीं सोचा?

4-      क्या औरों की तरह सत्ता में आने पर वे ब्राह्मणवादी सोच का शिकार हो गई या उनका शिकार जानबूझ कर किया गया, जिससे वे इस राजनीति के इस आतंक के कंधे को न काट दें?

5-      क्यों बीहड़ के सन्नाटों में अपनी ललकार से पहचानी जाने वाली ये दस्यु सुंदरियाँ राजनीति की देहलीज़ पर कदम रखते ही सन्नाटे के अंधेरों में गुम हो जाती है?         

         
   सवाल कई हैं लेकिन इनका जवाब ना तो हमारे देश की राजनीति दे पाती है और ना ही बीहड़ के वो सन्नाटे। पर इन दोनों के सन्नाटों के बीच जब हर बार एक 'दस्यु सुंदरी' बनकर हमारे सामने आती है तो ये सन्नाटे भी चीख-चीख कर यह सवाल करने लगते हैं मौजूदा व्यवस्था के उन जिम्मेदार लोगों से जो कानून को तथाकथित रसूख़दार माननीयों के सुविधानुसार अनुसार विवेचित करते हैं। जिन्हें नारी का उनके बराबर खड़े होना गवारा नहीं है| जो अपने अहम् और यौन कुंठा की तुष्टि के लिए बार-बार दस्यु सुन्दरी बनने के लिए किसी गरीब की बेटी को बाध्य करते हैं।

आज ज़रूरत है इस सोच को बदलने के लिए एक सकारात्मक-सार्थक व वैकल्पिक व्यवस्था में विश्वास सृजित व जागृत करने की| जहाँ बीहड़ के लोगों को सुरक्षा के साथ विकास के समान अवसर उपलब्ध हों। ज़रूरी है कि बीहड़ों के सन्नाटे मासूम बच्चियों की चीख़ नहीं बल्कि खिलखिलाहट के साथ गुन्जायमान हो।

हमें समझना होगा कि दस्यु सुन्दरियाँ सिर्फ मसालेदार फ़िल्मों की पटकथा की पात्र  नहीं हैं| बल्कि वे ग़रीबी व बेचारगी के सलीब पर चढ़ी वे नायिकाएँ हैं जो समाज द्वारा कई बार यातना-प्रताड़ना की कीलें ठोके जाने से मरने के बाद प्रतिशोध की अग्नि से उत्पन्न बीहड़ों को विवश होकर गले लगाती हैं।

स्वाती सिंह 

मंगलवार, 4 नवंबर 2014

विशाल भारत की सिकुड़ती 'बदहाल सड़कें'

सड़क' परिवहन का एक ऐसा माध्यम होता है जिसपर पूरी सभ्यता,संस्कृति या यूँ कहे पुरे देश के विकास का दारोमदार होता है। ये सड़कें ही तो है, जो हमें किसी नई जगह तक पहुंचती है और वहां की संस्कृति से हमें रु-ब-रु कराती हैं। सड़कों पर दौड़ते साधनों से, जहाँ एक ओर हम वहां के विकास दर का पता लगाया जा सकता है तो वहीं दूसरी तरफ, इन सड़कों के किनारे बसे बाज़ार और गाँव-घर से लोगों के जीवन-स्तर व जीवन-शैली और पूरी अर्थव्यवस्था का पता लगाया जा सकता है।अब सोचिए अगर भारत जैसे विशाल देश की चार लाख सत्तर हज़ार किलोमीटर तक फ़ैली सड़कें देश के यानी एक वर्ग किलोमीटर पर 0.66 किलोमीटर तक सिकुड़ती सड़कें कैसे देश के हर कोने को छू पाएंगी? और इसका देश के विकास और संस्कृति पर क्या प्रभाव पड़ेगा? इसका अनुमान लगा पाना मुश्किल है।
         आज़ादी के लगभग साठ सालों के बाद भी क्या दुनिया का सबसे बड़ा लोकतान्त्रिक देश सच में लोकतान्त्रिक बन पाया? ये प्रश्न अब भी लोगों के प्रश्नों से घिरा है। आज़ादी के बाद से कृषि से लेकर संचार तक,शिक्षा से लेकर सामाजिक सुधार तक बहुत कई सफल काम किए गये। लेकिन अफ़सोस,सरकार की तरफ से इन सबके मूल आधार की संरचना के विकास पर कोई ख़ास कदम नहीं उठाए गये। आज भी हमारे देश में एक जगह से दूसरी जगह तक पहुचने का सड़क ही एकमात्र साधन उपलब्ध है। इसके अलावा लोकल ट्रेन व मेट्रो जैसी सुविधाएँ कुछ शहरों तक ही सिमटी है,जो सड़क जाम की समस्या को सुलझाने में कहीं भी सफल नहीं दिखाई पड़ रही। जिसका अंदाजा दिल्ली,कलकत्ता,चेन्नई जैसे मेट्रों सिटी में बढ़ती सड़क दुर्घटनाओं और जाम की समस्या से लगाया जा सकता है।
        भारत में सिकुड़ती इन बदहाल सड़कों की समस्या के कारणों पर अध्ययन करने पर पता चलता है कि यहाँ तीन चीज़ों सबसे ज्यादा अभाव है-शिक्षा,तकनीक और इन्हें लागू करने का अप्रभावशाली तरीका। भारत में हर साल थोक के भाव युवा इनजीनियर की भर्ती सड़क निर्माण विभाग में की जाती है तो वहीं दूसरी ओर सड़क टूटने,अतिक्रमण और फ्लाईओवर टूटने की घटनाएँ भी सामने आ रही है। भारत में स्मार्ट फ़ोन इस्तेमाल करने वालों और आधुनिक वाहनों का प्रयोग तो बहुत जमकर किया जाता है,लेकिन जब बात आती है सड़क-निर्माण की तो वही बरसों पुरानी गिट्टी-अलकतरा की तकनीक ही लागू की जाती है।कमी सिर्फ यहीं तक नहीं लोगों के व्यवहार और शिक्षा व तकनीक को लागू करने में भी है।
        भारत में अधिकांश लोग ऐसे है जिन्हें अपने रोटी,कपड़ा और मकान के अलावा हर चीज़ बेगानी नजर आती है,जिसका नतीज़ा ये होता है कि सड़क-परिवहन के किसी भी नियम से ये अपना कोई वास्ता नहीं रखते। नतीजन सड़क दुर्घटना की वारदातें बढ़ती जा रही है। इसलिए शिक्षा,तकनीक के साथ-साथ लोगों की सोच में परिवर्तन होने के बाद ही सिकुड़ती इन बदहाल सड़कों का विस्तार और देश का विकास संभव होगा।

स्वाती सिंह